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Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 7/9/4

118 Sukta
4 Mantra
7/9/4
Devata- पूषा Rishi- उपरिबभ्रवः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- स्वस्तिदा पूषा सूक्त
Mantra with Swara
परि॑ पू॒षा प॒रस्ता॒द्धस्तं॑ दधातु॒ दक्षि॑णम्। पुन॑र्नो न॒ष्टमाज॑तु॒ सं न॒ष्टेन॑ गमेमहि ॥

परि॑ । पू॒षा । प॒रस्ता॑त् । हस्त॑म् । द॒धा॒तु॒ । दक्ष‍ि॑णम् । पुन॑: । न॒: । न॒ष्टम् । आ । अ॒जतु॒ । सम् । न॒ष्टेन॑ । ग॒मे॒म॒हि॒ ॥१०.४॥

Mantra without Swara
परि पूषा परस्ताद्धस्तं दधातु दक्षिणम्। पुनर्नो नष्टमाजतु सं नष्टेन गमेमहि ॥

परि । पूषा । परस्तात् । हस्तम् । दधातु । दक्ष‍िणम् । पुन: । न: । नष्टम् । आ । अजतु । सम् । नष्टेन । गमेमहि ॥१०.४॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (पूषा) = यह पोषक प्रभु (परस्तात्) = अति दूर देश से भी धन के आदान के लिए हमें (दक्षिणं हस्तं दधातु) = कार्यकुशल हाथ प्राप्त कराएँ। हमें इसप्रकार शक्ति दें कि हम दूर-से-दूर देशों से भी धनार्जन करने में समर्थ हों। २. (न:) = हमें (नष्टम्) = नष्ट हुआ धन (पुनः आजतु) = पुनः प्राप्त हो और (नष्टेन) = उस नष्ट धन से हम (संगमेमहि)= फिर से संगत हो पाएँ।
Essence
प्रभुकृपा से हमें कार्यकुशल हाथ प्राप्त हों और हम नष्ट धनों को भी पुनः प्राप्त कर सकें।

कुशलता से कार्य करता हुआ यह व्यक्ति 'शौनक' बनता है [शुनम् इति सुखनाम] सुखी जीवनवाला होता है। यह शौनक ही अगले तीन सूक्तों का ऋषि है।

 
Subject
दक्षिण हाथ