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Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 7/89/4

118 Sukta
4 Mantra
7/89/4
Devata- अग्निः Rishi- सिन्धुद्वीपः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- दिव्यआपः सूक्त
Mantra with Swara
एधो॑ऽस्येधिषी॒य स॒मिद॑सि॒ समे॑धिषीय। तेजो॑ऽसि॒ तेजो॒ मयि॑ धेहि ॥

एध॑: । अ॒सि॒ । ए॒धि॒षी॒य । स॒म्ऽइत् । अ॒सि॒ । सम् । ए॒धि॒षी॒य॒ । तेज॑: । अ॒सि॒ । तेज॑: । मयि॑ । धे॒हि॒ ॥९४.४॥

Mantra without Swara
एधोऽस्येधिषीय समिदसि समेधिषीय। तेजोऽसि तेजो मयि धेहि ॥

एध: । असि । एधिषीय । सम्ऽइत् । असि । सम् । एधिषीय । तेज: । असि । तेज: । मयि । धेहि ॥९४.४॥

Meaning
१. हे अने! (एधः असि) = [एध वृद्धौ] आप सदा से बढ़े हुए हो, (एधिषीय) = मैं भी स्वास्थ्य, नैर्मल्य व ज्ञान' की दृष्टि से बढ़ा हुआ बनें। हे प्रभो। आप (समित् असि) = [इन्ध] सम्यक् दीप्त हैं, मैं भी (समेधिषीय) = सम्यक् दीस बनूं। आप (तेजः असि) = तेज के पुञ्ज हैं, (मयि तेज: धेहि) = मुझमें तेज का आधान कीजिए।
Essence
सदा से वृद्ध प्रभु मुझे बढ़ाएँ। दीप्त प्रभु की उपासना मुझे भी दीप्त करे, तेजस्वी प्रभु मुझमें तेज का आधान करें।

तेजस्वी बनकर यह अंग-प्रत्यंग में रसवाला 'अंगिरा:' बनता है। यही अगले सूक्त का ऋषि है -
Subject
एधः समित तेजः

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