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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 7/84/2

118 Sukta
3 Mantra
7/84/2
Devata- इन्द्रः Rishi- भृगुः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- क्षत्रभृदग्नि सूक्त
Mantra with Swara
इन्द्र॑ क्ष॒त्रम॒भि वा॒ममोजोऽजा॑यथा वृषभ चर्षणी॒नाम्। अपा॑नुदो॒ जन॑ममित्रा॒यन्त॑मु॒रुं दे॒वेभ्यो॑ अकृणोरु लो॒कम् ॥

इन्द्र॑ । क्ष॒त्रम् । अ॒भ‍ि । वा॒मम् । ओज॑: । अजा॑यथा: । वृ॒ष॒भ॒: । च॒र्ष॒णी॒नाम् । अप॑ । अ॒नु॒द॒: । जन॑म् । अ॒मि॒त्र॒ऽयन्त॑म् । उ॒रुम् । दे॒वेभ्य॑: । अ॒कृ॒णो॒: । ऊं॒ इति॑ । लो॒कम् ॥८९.२॥

Mantra without Swara
इन्द्र क्षत्रमभि वाममोजोऽजायथा वृषभ चर्षणीनाम्। अपानुदो जनममित्रायन्तमुरुं देवेभ्यो अकृणोरु लोकम् ॥

इन्द्र । क्षत्रम् । अभ‍ि । वामम् । ओज: । अजायथा: । वृषभ: । चर्षणीनाम् । अप । अनुद: । जनम् । अमित्रऽयन्तम् । उरुम् । देवेभ्य: । अकृणो: । ऊं इति । लोकम् ॥८९.२॥

Meaning
१. हे (इन्द्र) = शत्रु-विद्रावक प्रभो! आप (क्षत्रम्) = बल तथा (वामम् ओजः) = सेवनीय ओज को (अभि) = लक्ष्य करके (अजायथा:) = प्रादुर्भूत होते हैं। आपके प्रादुर्भाव से उपासक के जीवन में क्षत्र और ओज की स्थापना होती हैं। २. हे (चर्षणीनां वृषभ) = श्रमशील मनुष्यों पर सुखों का वर्षण करनेवाले प्रभो! आज (अमित्रायन्तम्) = अमित्र [शत्रु] की भाँति आचरण करते हुए जनम् मनुष्य को (अपानुदः) = हमसे दूर कीजिए (उ) = और (देवेभ्यः) = देववृत्ति के पुरुषों के लिए उस लोक (अकृणो:) = विस्तीर्ण स्वर्ग-प्रकाशमयलोक को कीजिए।
Essence
हृदय में प्रभु के प्रादुर्भाव से 'क्षत्र और ओज' की प्राप्ति होती है। प्रभु हमारे शत्रुओं को दूर करके हमारे लिए उत्तम प्रकाशमय लोक को प्राप्त करानेवाले होते हैं।
Subject
क्षत्रम् ओजः

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