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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 7/78/2

118 Sukta
2 Mantra
7/78/2
Devata- अग्निः Rishi- अथर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- बन्धमिचन सूक्त
Mantra with Swara
अ॒स्मै क्ष॒त्राणि॑ धा॒रय॑न्तमग्ने यु॒नज्मि॑ त्वा॒ ब्रह्म॑णा॒ दैव्ये॑न। दी॑दि॒ह्यस्मभ्यं॒ द्रवि॑णे॒ह भ॒द्रं प्रेमं वो॑चो हवि॒र्दां दे॒वता॑सु ॥

अ॒स्मै । क्ष॒त्राणि॑ । धा॒रय॑न्तम् । अ॒ग्ने॒ । यु॒नज्मि॑ । त्वा॒ । ब्रह्म॑णा । दैव्ये॑न । दी॒दि॒हि । अ॒स्मभ्य॑म् । द्रवि॑णा । इ॒ह । भ॒द्रम् । प्र । इ॒मम् । वो॒च॒: । ह॒वि॒:ऽदाम् । दे॒वता॑सु ॥८३.२॥

Mantra without Swara
अस्मै क्षत्राणि धारयन्तमग्ने युनज्मि त्वा ब्रह्मणा दैव्येन। दीदिह्यस्मभ्यं द्रविणेह भद्रं प्रेमं वोचो हविर्दां देवतासु ॥

अस्मै । क्षत्राणि । धारयन्तम् । अग्ने । युनज्मि । त्वा । ब्रह्मणा । दैव्येन । दीदिहि । अस्मभ्यम् । द्रविणा । इह । भद्रम् । प्र । इमम् । वोच: । हवि:ऽदाम् । देवतासु ॥८३.२॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (अस्मै) = इस अपने उपासक के लिए (क्षत्राणि धारयन्तम्) = बलों का धारण करनेवाले (त्वा) = आपको, हे (अग्ने) = प्रभो! (दैव्येन ब्रह्मणा) = देव से प्राप्त ज्ञान के द्वारा, प्रभु को प्रास करनेवाले ज्ञान के द्वारा,(युनज्मि) = अपने साथ जोड़ता हूँ। प्रभु हमें बल प्राप्त कराते हैं, हम ज्ञान के द्वारा प्रभु को प्रास करनेवाले बनें। २. हे प्रभो! आप (इह) = इस जीवन में (द्रविणा) = धनों को (भद्रम्) = कल्याण व सुख को (दीदिहि) = दीजिए अथवा हमारे लिए धन आदि को दीस कीजिए। (इमं हविर्दाम्) = इस हवि देनेवाले यज्ञशील पुरुष को (देवतासु प्रवोच:) = देवों के विषय में प्रकृष्ट ज्ञान दीजिए। इन सूर्य आदि देवों का ज्ञान प्राप्त करके हम उनसे उचित लाभ प्राप्त करते हुए उन्नत जीवनवाले बनें|
Essence
प्रभु हमें 'बल , धन , कल्याण व ज्ञान ' प्राप्त कराते हैं| हम ज्ञान प्रभु को प्राप्त करने के लिए यत्नशील हों|

प्रभु से बल आदि को प्राप्त करनेवाला अथर्वा प्रार्थना करता है कि-
Subject
क्षत्राणि द्रविणा भद्रम्