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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 7/77/2

118 Sukta
3 Mantra
7/77/2
Devata- मरुद्गणः Rishi- अङ्गिराः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- शत्रुनाशन सूक्त
Mantra with Swara
यो नो॒ मर्तो॑ मरुतो दुर्हृणा॒युस्ति॒रश्चि॒त्तानि॑ वसवो॒ जिघां॑सति। द्रु॒हः पाशा॒न्प्रति॑ मुञ्चतां॒ स तपि॑ष्ठेन॒ तप॑सा हन्तना॒ तम् ॥

य: । न॒: । मर्त॑: । म॒रु॒त॒: । दु॒:ऽहृ॒णा॒यु: । ति॒र: । चि॒त्तानि॑ । व॒स॒व॒: । जिघां॑सति । द्रु॒ह: । पाशा॑न् । प्रत‍ि॑ । मु॒ञ्च॒ता॒म् । स: । तपि॑ष्ठेन । तप॑सा । ह॒न्त॒न॒ । तम् ॥८२.२॥

Mantra without Swara
यो नो मर्तो मरुतो दुर्हृणायुस्तिरश्चित्तानि वसवो जिघांसति। द्रुहः पाशान्प्रति मुञ्चतां स तपिष्ठेन तपसा हन्तना तम् ॥

य: । न: । मर्त: । मरुत: । दु:ऽहृणायु: । तिर: । चित्तानि । वसव: । जिघांसति । द्रुह: । पाशान् । प्रत‍ि । मुञ्चताम् । स: । तपिष्ठेन । तपसा । हन्तन । तम् ॥८२.२॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. हे (वसवः) = बसानेवाले, प्रशस्य अथवा वसुप्रद मरुतो! (यः मतः) = जो भी मनुष्य (दुर्हृणायु:) = बुरी तरह से क्रोध करता हुआ (तिर:) = तिरोभूत, अन्तर्हित हुआ-हुआ (नः चित्तानि) = हमारे चित्तों को जिघांसति नष्ट करना चाहता है, हमें क्षुब्ध करता है, (सः) = वह (द्रुहः पाशान्) = पापों के द्रोग्धा वरुण के पाशों को (प्रतिमुञ्चताम्) = धारण करे, वरुण के पाशों से बद्ध हो-प्रभु उसे दण्डित करें। (तपिष्ठेन तपसा) = अतिशयेन दीप्ति को प्राप्त करानेवाले तप से (तं हन्तन) = उसे विनष्ट करो। २. यदि कोई मनुष्य छिपे रूप में हमारे प्रति क्रोध की भावनावाला होकर हमारे मनोरथों को नष्ट करना चाहता है, तो हम उसके प्रति क्रोध न करते हुए यही सोचें कि प्रभु उसे उसके अपराध के लिए दण्डित करेंगे तथा हम तप के द्वारा जीवन को दीप्त बनाते हुए उसके क्रोध को नष्ट करने का यत्न करें।
Essence
जो क्रोधी मनुष्य हमें क्षुब्ध करना चाहता है,वह वरुण के पाशों में जकड़ा जाए।
Subject
'वसवः' मरुतः