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Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 7/76/1

118 Sukta
6 Mantra
7/76/1
Devata- अपचिद् भैषज्य्म् Rishi- अथर्वा Chhanda- विराडनुष्टुप् Suktam- गण्डमालाचिकित्सा सूक्त
Mantra with Swara
आ सु॒स्रसः॑ सु॒स्रसो॒ अस॑तीभ्यो॒ अस॑त्तराः। सेहो॑रर॒सत॑रा लव॒णाद्विक्ले॑दीयसीः ॥

आ । सु॒ऽस्रस॑: । सु॒ऽस्रस॑: । अस॑तीभ्य: । अस॑त्ऽतरा: । सेहो॑: । अ॒र॒सऽत॑रा: । ल॒व॒णात् । विऽक्ले॑दीयसी: ॥८०.१॥

Mantra without Swara
आ सुस्रसः सुस्रसो असतीभ्यो असत्तराः। सेहोररसतरा लवणाद्विक्लेदीयसीः ॥

आ । सुऽस्रस: । सुऽस्रस: । असतीभ्य: । असत्ऽतरा: । सेहो: । अरसऽतरा: । लवणात् । विऽक्लेदीयसी: ॥८०.१॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (सुस्त्रस:) = अतिशयेन स्रवणशील-सर्वदा पूय [पस] आदि के रूप में स्रवणशील, अतएव (असतीभ्यः) = पीड़ित करनेवाले रोगी व्यक्तियों से भी (असत्तरा:) = अतिशयेन बाधिका ये गण्डमालाएँ (आसुस्वस:) = समन्तात् निरवशेषेण स्रवणशील हों, नि:शेष स्रवण से ये नष्ट हो जाएँ। २. (सेहो:) = [सेहुर्नाम विप्रकीर्णावयवः अत्यन्तं नि:सारस्तूलादिरूपः पदार्थः] अत्यन्त नीरस तूल आदि रूप पदार्थ से भी (असत्तरा:) = ये गण्डमालाएँ नि:सारतर है, पाकावस्था से पूर्व ये बाधिका हैं ही नहीं। अब ये कक्षादिसन्धि-प्रदेशों में व्याप्त हुई-हुई व्रणरूपेण बाधित करने लगती हैं। सब अवयवों में व्याप्त हो जाने के बाद (लवणात्) = लवण से (विक्लेदीयसी:) = अतिशयेन विविध क्लेदनवाली होती हैं। लवण के प्रयोग से ये गण्डमालाएँ पूय आदि के रूप में स्रवणशील हो जाती हैं और इसप्रकार लवणवाली होकर ये नष्ट हो जाती हैं।
Essence
पूय आदि के सवणवाली व सेहु के समान शुष्क गण्डमालाएँ भी लवण के प्रयोग से क्लिन्न होकर खूब लवणशील हो जाती है। सवणशील होकर ही ये नष्ट होती हैं।
Subject
गण्डमाला में लवण का प्रयोग