Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 7/74/4

118 Sukta
4 Mantra
7/74/4
Devata- जातवेदाः Rishi- अथर्वाङ्गिराः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- गण्डमालाचिकित्सा सूक्त
Mantra with Swara
व्र॒तेन॒ त्वं व्र॑तपते॒ सम॑क्तो वि॒श्वाहा॑ सु॒मना॑ दीदिही॒ह। तं त्वा॑ व॒यं जा॑तवेदः॒ समि॑द्धं प्र॒जाव॑न्त॒ उप॑ सदेम॒ सर्वे॑ ॥

व्र॒तेन॑ । त्वम् । व्र॒त॒ऽप॒ते॒ । सम्ऽअ॑क्त: । वि॒श्वाहा॑ । सु॒ऽमना॑: । दी॒दि॒हि॒ । इ॒ह । तम् । त्वा॒ । व॒यम् । जा॒त॒ऽवे॒द॒: । सम्ऽइ॑ध्दम् । प्र॒जाऽव॑न्त: । उप॑ । स॒दे॒म॒ । सर्वे॑ ॥७८.४॥

Mantra without Swara
व्रतेन त्वं व्रतपते समक्तो विश्वाहा सुमना दीदिहीह। तं त्वा वयं जातवेदः समिद्धं प्रजावन्त उप सदेम सर्वे ॥

व्रतेन । त्वम् । व्रतऽपते । सम्ऽअक्त: । विश्वाहा । सुऽमना: । दीदिहि । इह । तम् । त्वा । वयम् । जातऽवेद: । सम्ऽइध्दम् । प्रजाऽवन्त: । उप । सदेम । सर्वे ॥७८.४॥

Meaning
१. हे (व्रतपते) = व्रतों के रक्षक प्रभो ! (त्वम्) = आप (व्रतेन समक्त:) = व्रत के द्वारा, पुण्य कर्मों के द्वारा संस्कृत-सम्भावित-सम्यक् इष्ट [पूजित] होते हो। व्रतों द्वारा समक्त हुए-हुए आप (विश्वाहा) = सदा (सुमना:) = शोभन मनवाले-हमारे विषय में अनुग्रहबुद्धियुक्त होते हुए (इह) = यहाँ हमारे घर में (दीदिहि) = दीत होओ। २. हे (जादवेदः) = सर्वज्ञ प्रभो! (समिद्धम्) = सम्यक् (दीप्ततं त्या) = उन आपको (प्रजावन्त:) = पुत्रों के समेत सर्वे (वयम्) = हम सब (उपसदेम) = उपासित करें। हम सब मिलकर आपकी उपासना करनेवाले बनें। यह उपासना ही हमें व्रतमय जीवनवाला बनाकर ईया, क्रोध आदि से बचाएगी।
Essence
पुण्यकर्मों द्वारा हम व्रतपति प्रभु को अपने जीवन में सम्भावित करें। हम मिलकर प्रातः-सायं घर में प्रभु का उपासन करें। यह उपासन हमें ईर्ष्या व क्रोध से दूर रक्खेगा।

ये उपासक अपने को ईर्ष्या, क्रोध आदि से ऊपर उठाते हैं, अत: 'उपरिबभ्रव' कहलाते हैं। गोदुग्ध का सेवन इन्हें ऊपर उठने में सहायक होता है। ये 'उपरिबभ्रवः' ही अगले सूक्त का ऋषि है -

 
Subject
व्रतपति प्रभु का मिलकर उपासन

We are thankful to https://vedicscriptures.in for providing us a substantial amount of data for this section of the Vedas.