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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 7/74/2

118 Sukta
4 Mantra
7/74/2
Devata- जातवेदाः Rishi- अथर्वाङ्गिराः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- गण्डमालाचिकित्सा सूक्त
Mantra with Swara
विध्या॑म्यासां प्रथ॒मां वि॑ध्याम्यु॒त म॑ध्य॒माम्। इ॒दं ज॑घ॒न्यामासा॒मा छि॑नद्मि॒ स्तुका॑मिव ॥

विध्या॑मि । आ॒सा॒म् । प्र॒थ॒माम् । विध्या॑मि । उ॒त । म॒ध्य॒माम् । इ॒दम् । ज॒घ॒न्या᳡म् । आ॒सा॒म् । आ । छि॒न॒द्मि॒ । स्तुका॑म्ऽइव ॥७८.२॥

Mantra without Swara
विध्याम्यासां प्रथमां विध्याम्युत मध्यमाम्। इदं जघन्यामासामा छिनद्मि स्तुकामिव ॥

विध्यामि । आसाम् । प्रथमाम् । विध्यामि । उत । मध्यमाम् । इदम् । जघन्याम् । आसाम् । आ । छिनद्मि । स्तुकाम्ऽइव ॥७८.२॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. दोष के प्रकर्ष, साम्य [मध्यमस्थिति] व अल्पत्व के भेद से गण्डमाला भी तीन भागों में बँट जाती है। (आसाम्) = इन गण्डमालाओं में (प्रथमाम्) = दोषप्रकर्षेण उद्भुत दुश्चिकित्स्य गण्डमाला को (विध्यामि) = बंगसेन तरु के मूल से बींधता हूँ (उत) = और (मध्यमाम्) = दोष साम्य [मध्यम स्थितिवाले दोष] से उद्भूत न अधिक दुःसाध्य गण्डमाला को भी बींधता हूँ। २. (इदम्) = [इदानी] अब (आसाम्) = इन गण्डमालाओं में (जघन्याम्) = अल्पदोष समुद्भूता अतएव थोड़े से प्रयत्न से चिकित्सनीया गण्डमाला को भी (स्तुकाम् इव) = ऊन के बाल की भाँति (आच्छिनधि) = सर्वत: छिन्न कर देता हूँ।
Essence
'तीव्र, मध्यम व अल्प जिस भी स्थिति में गण्डमाला हो, उसे एकदम दूर करना ही अभीष्ट है और यह वंगसेन तरु के मूल से हो सकता है।
Subject
तीव्र, मध्यम व अल्प' स्थिति में गण्डमाला