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Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 7/74/1

118 Sukta
4 Mantra
7/74/1
Devata- जातवेदाः Rishi- अथर्वाङ्गिराः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- गण्डमालाचिकित्सा सूक्त
Mantra with Swara
अ॑प॒चितां॒ लोहि॑नीनां कृ॒ष्णा मा॒तेति॑ शुश्रुम। मुने॑र्दे॒वस्य॒ मूले॑न॒ सर्वा॑ विध्यामि॒ ता अ॒हम् ॥

अ॒प॒ऽचिता॑म् । लोहि॑नीनाम् । कृ॒ष्णा । मा॒ता । इति॑ । शु॒श्रु॒म॒ । मुने॑: । दे॒वस्य॑ । मूले॑न । सर्वा॑: । वि॒ध्या॒मि॒ । ता: । अ॒हम् ॥७८.१॥

Mantra without Swara
अपचितां लोहिनीनां कृष्णा मातेति शुश्रुम। मुनेर्देवस्य मूलेन सर्वा विध्यामि ता अहम् ॥

अपऽचिताम् । लोहिनीनाम् । कृष्णा । माता । इति । शुश्रुम । मुने: । देवस्य । मूलेन । सर्वा: । विध्यामि । ता: । अहम् ॥७८.१॥

Meaning
१. दोषवश [अपाकचीयमाना] गले से लेकर नीचे कक्षादि सन्धि-स्थानों में फैलनेवाली गण्डमाला 'अपचित्' है। (लोहिनीनाम्) = इन लाल वर्ण की (अपचिताम्) = गण्डमाला की ग्रन्थियों की (माता) = जननी (कृष्णा इति शश्रम) = काले वर्ण की नाड़ियाँ हैं, ऐसा सुना जाता है। जिन नाड़ियों में शुद्ध लाल वर्ण का रक्त बहता है, उनसे भिन्न अशुद्ध नील वर्ण के रक्त की नाडियों 'कृष्णा' हैं। इनके कारण ही गण्डमाला की ग्रन्थियों को जन्म मिलता है, अर्थात् अशुद्धरक्त के कारण ये ग्रन्थियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। २. (ताः सर्वा:) = उन सब गण्डमाला की ग्रन्थियों को (अहम) = मैं (देवस्य) = रोग को जीतने की कामनावाले (मुने:) = 'वंगसेन' तरु के (मूलेन) = मूल से (विध्यामि) = विद्ध करता हूँ।
Essence
वंगसेन [अथवा प्रियाल, अगस्ति व पलाश] वृक्ष के मूल से गण्डमाला की प्रन्थियों का वेधन किया जा सकता है। ये ग्रन्थियाँ अशुद्ध रक्त के कारण उद्भूत हो जाती हैं। 'मुनिः पुंसी वसिष्ठादौ वंगसेनतरौजिने' मेदिनी, [मुनिश्चन्मतेऽर्हति प्रियालागस्तिपालाशे]।
Subject
गण्डमाला की चिकित्सा

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