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Atharvaveda - Mantra 9

Atharvaveda 7/73/9

118 Sukta
11 Mantra
7/73/9
Devata- घर्मः, अश्विनौ Rishi- अथर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- धर्म सूक्त
Mantra with Swara
जुष्टो॒ दमू॑ना॒ अति॑थिर्दुरो॒ण इ॒मं नो॑ य॒ज्ञमुप॑ याहि वि॒द्वान्। विश्वा॑ अग्ने अभि॒युजो॑ वि॒हत्य॑ शत्रूय॒तामा भ॑रा॒ भोज॑नानि ॥

जुष्ट॑: । दमू॑ना: । अति॑थि: । दु॒रो॒णे । इ॒मम् । न॒: । य॒ज्ञम् । उप॑ । या॒हि॒ । वि॒द्वान् । विश्वा॑: । अ॒ग्ने॒ । अ॒भि॒ऽयुज॑: । वि॒ऽहत्य॑ । श॒त्रु॒ऽय॒ताम् । आ । भ॒र॒ । भोज॑नानि ॥७७.९॥

Mantra without Swara
जुष्टो दमूना अतिथिर्दुरोण इमं नो यज्ञमुप याहि विद्वान्। विश्वा अग्ने अभियुजो विहत्य शत्रूयतामा भरा भोजनानि ॥

जुष्ट: । दमूना: । अतिथि: । दुरोणे । इमम् । न: । यज्ञम् । उप । याहि । विद्वान् । विश्वा: । अग्ने । अभिऽयुज: । विऽहत्य । शत्रुऽयताम् । आ । भर । भोजनानि ॥७७.९॥

Meaning
१. हे प्रभो! आप (जुष्ट:) = प्रीतिपूर्वक सेवित हुए-हुए (दमूना:) = [दानमना:-नि० ४।४] सब-कुछ देने के मनवाले (अतिथि:) = निरन्तर गतिशील (विद्वान्) = ज्ञानी हैं। ये प्रभु (नः दुरोणे) = इस हमारे घर में (इमं यज्ञं उपयाहि) = इस यज्ञ को प्रास हों। हम सब घरों में यज्ञशील बनें। यज्ञों द्वारा प्रभु की उपासना करते हुए प्रभु को प्राप्त करें। २.हे (अग्रे) = अग्रणी प्रभो! (विश्वा:) = सब (शत्रूयताम्) = शत्रु की भाँति आचरण करते हुए लोगों की (अभियुज:) = आक्रमणकारिणी पर-सेनाओं को (विहत्य) = नष्ट करके (भोजनानि आभर) = हमारे लिए पालन-साधनों को प्राप्त कराइए। इसप्रकार व्यवस्था कीजिए कि हम शत्रुओं को पराजित करके ठीक प्रकार अपना पालन कर सकें।
Essence
हम यज्ञों द्वारा प्रौतिपूर्वक प्रभु का उपासन करें। प्रभु हमारे शत्रुओं का विनाश करें। प्रभु हमें पालन-साधनों को प्राप्त कराएं।
Subject
प्रभु-उपासन व शत्रु-विनाश

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