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Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 7/72/1

118 Sukta
3 Mantra
7/72/1
Devata- इन्द्रः Rishi- अथर्वा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- इन्द्र सूक्त
Mantra with Swara
उत्ति॑ष्ठ॒ताव॑ पश्य॒तेन्द्र॑स्य भा॒गमृ॒त्विय॑म्। यदि॑ श्रा॒तं जु॒होत॑न॒ यद्यश्रा॑तं म॒मत्त॑न ॥

उत् । ति॒ष्ठ॒त॒ । अव॑ । प॒श्य॒त॒ । इन्द्र॑स्य । भा॒गम् । ऋ॒त्विय॑म् । यदि॑ । श्रा॒तम् । जु॒होत॑न । यदि॑ । अश्रा॑तम् । म॒मत्त॑न ॥७५.१॥

Mantra without Swara
उत्तिष्ठताव पश्यतेन्द्रस्य भागमृत्वियम्। यदि श्रातं जुहोतन यद्यश्रातं ममत्तन ॥

उत् । तिष्ठत । अव । पश्यत । इन्द्रस्य । भागम् । ऋत्वियम् । यदि । श्रातम् । जुहोतन । यदि । अश्रातम् । ममत्तन ॥७५.१॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. प्रभु कहते हैं कि (उत्तिष्ठत) = उठो, आलस्य को छोड़ो, लेटे ही न रहो। (अवपश्यत) = अपने अन्दर देखनेवाले बनो। अपनी कमियों को देखकर उन्हें दूर करनेवाले बनो। (इन्द्रस्य) = इन्द्रियों के अधिष्ठाता जीव के (ऋत्वियम्) = समय पर प्राप्त (भागम्) = कर्तव्यभाग को देखनेवाले बनो। जो तुम्हारा प्रस्तुत कर्तव्य है, उसे देखकर उसके पालन में तत्पर होवो। जीवन के प्रथमा श्रम में 'ज्ञान-प्राप्ति' ही मुख्य कर्तव्य है। उस ज्ञान-प्रासिरूप कर्तव्य को देखकर उस ज्ञान-प्राप्ति में लंगे रहना ही ब्रह्मचारी के लिए शोभा देता है। २. आचार्य का कर्तव्य है कि यदि वह (श्रातम्) = यह अनुभव करे कि उसका विद्यार्थी ज्ञानपरिपक्व हो गया है, तो उस ज्ञानपरिपक्व विद्यार्थी को (जुहोतन) = आहुत कर दे, उसकी गृहस्थयज्ञ में आहुति दे दे, उसे गृहस्थ में प्रवेश की स्वीकृति दे दे, परन्तु यदि (अश्रातम्) = वह अभी ज्ञानपरिपक्व नहीं हुआ तो (ममत्तन) = उसे [पचत-सा०] अभी और पक्व करने का यत्न करे अथवा उसे अभी ज्ञान-प्राप्ति में ही आनन्द लेने के लिए प्रेरित करे।
Essence
उठो, अपनी कमियों को दूर करो। ब्रह्मचर्याश्चम में अपने को ज्ञानपरिपक्व करके गृहस्थ में जाने के लिए तैयारी करो।
Subject
'श्रातं जुहोतन' ब्रह्मचर्य से गृहस्थ में