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Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 7/68/1

118 Sukta
3 Mantra
7/68/1
Devata- सरस्वती Rishi- शन्तातिः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- सरस्वती सूक्त
Mantra with Swara
सर॑स्वति व्र॒तेषु॑ ते दि॒व्येषु॑ देवि॒ धाम॑सु। जु॒षस्व॑ ह॒व्यमाहु॑तं प्र॒जां दे॑वि ररास्व नः ॥

सर॑स्वति । व्र॒तेषु॑ । ते॒ । दि॒व्येषु॑ । दे॒वि॒ । धाम॑ऽसु । जु॒षस्व॑ । ह॒व्यम् । आऽहु॑तम् । प्र॒ऽजाम् । दे॒वि॒ । र॒रा॒स्व॒ । न॒: ॥७०.१॥

Mantra without Swara
सरस्वति व्रतेषु ते दिव्येषु देवि धामसु। जुषस्व हव्यमाहुतं प्रजां देवि ररास्व नः ॥

सरस्वति । व्रतेषु । ते । दिव्येषु । देवि । धामऽसु । जुषस्व । हव्यम् । आऽहुतम् । प्रऽजाम् । देवि । ररास्व । न: ॥७०.१॥

Meaning
१.हे (सरस्वति देवि) = ज्ञान की अधिष्ठातृदेवि! [ज्ञान प्रवाह से, गुरु से शिष्य की ओर चलता है, अत: ज्ञान की अधिष्ठात्री 'सरस्वती' कहलाती है। यह प्रकाशमय होने से 'देवी' है] (ते खतेषु) = तेरे व्रतों में चलते हुए हम लोगों द्वारा (दिव्येषु धामसु) = दिव्य तेजों के निमित्त (आहुतम्) = पहले अग्निकुण्ड में आहुत किये गये यज्ञावशिष्ट (हव्यं जुषस्व) = हव्य का ही तू प्रीतिपूर्वक ग्रहण कर, अर्थात् तेरे व्रतों में चलते हुए हम यज्ञावशिष्ट हव्यों को ही ग्रहण करनेवाले बनें। तभी हमें 'दिव्य धाम [तेज]' प्राप्त होंगे। २. हे सरस्वति देवि! तू (न:) = हमारे लिए (प्रजा ररास्व) = प्रशस्त सन्तानों को प्रास करा । जहाँ घर में ज्ञानप्रधान वातावरण होगा, वहाँ सन्ताने उत्तम होंगे ही। ज्ञान के साथ व्यसनों का विरोध है।
Essence
सरस्वती का आराधक यज्ञावशिष्ट हव्य पदार्थों का ही सेवन करता है। इससे उसे दिव्य तेज प्राप्त होता है और घर में सन्तान भी उत्तम होती हैं।
Subject
सरस्वती के व्रतों में

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