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Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 7/62/1

118 Sukta
1 Mantra
7/62/1
Devata- अग्निः Rishi- कश्यपः Chhanda- जगती Suktam- शत्रुनाशन सूक्त
Mantra with Swara
अ॒यम॒ग्निः सत्प॑तिर्वृ॒द्धवृ॑ष्णो र॒थीव॑ प॒त्तीन॑जयत्पु॒रोहि॑तः। नाभा॑ पृथि॒व्यां निहि॑तो॒ दवि॑द्युतदधस्प॒दं कृ॑णुतां॒ ये पृ॑त॒न्यवः॑ ॥

अ॒यम् । अ॒ग्नि: । सत्ऽप॑ति:। वृ॒ध्‍दऽवृ॑ष्ण: । र॒थीऽइ॑व । प॒त्तीन् । अ॒ज॒य॒त् । पु॒र:ऽहि॑त: । नाभा॑ । पृथि॒व्याम् ।‍ निऽहि॑त: । दवि॑द्युतत् । अ॒ध॒:ऽप॒दम् । कृ॒णु॒ता॒म् । ये । पृ॒त॒न्यव॑: ॥६४.१॥

Mantra without Swara
अयमग्निः सत्पतिर्वृद्धवृष्णो रथीव पत्तीनजयत्पुरोहितः। नाभा पृथिव्यां निहितो दविद्युतदधस्पदं कृणुतां ये पृतन्यवः ॥

अयम् । अग्नि: । सत्ऽपति:। वृध्‍दऽवृष्ण: । रथीऽइव । पत्तीन् । अजयत् । पुर:ऽहित: । नाभा । पृथिव्याम् ।‍ निऽहित: । दविद्युतत् । अध:ऽपदम् । कृणुताम् । ये । पृतन्यव: ॥६४.१॥

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Meaning
१. (अयम्) = यह कश्यप (अग्नि:) = अग्नणी है, स्वयं उन्नति-पथ पर चलता हुआ औरों को भी उन्नति-पथ पर ले-चलता है। (सत्पतिः) = सज्जनों का रक्षक है। (वृद्धवृष्ण:) = बढ़े हुए बलवाला है। शत्रुओं को इसप्रकार (अजयत्) = जीत लेता है, (इव) = जैसेकि (रथी पत्तीन) = एक रथी पैदलों पर विजय पानेवाला होता है। यह शरीररूप रथ पर आरूढ़ हुआ-हुआ काम, क्रोध आदि शत्रुओं का पराभव करता है। (पुरोहित:) = यह औरों के सामने [पुर:] आदर्शरूप से स्थापित [हित:] होता है, इसका जीवन औरों के लिए आदर्श उपस्थित करता है। २. (पृथिव्याम् नाभा) = [अयं यज्ञो भुवनस्य नाभिः] यज्ञों में [पृथिवी के केन्द्रभूत यज्ञों में] (निहित:) = स्थापित होता है और (दविद्युतत्) = खूब ही चमकता है। यह यज्ञशील पुरुष उनको (अधस्पदं कृणुताम्) = पाँव तले रोदनेवाला हो, (ते पृतन्यवः) = जो शत्रु इसके साथ संग्राम के इच्छुक होते हैं, उन शत्रुओं को मार डालने से ही तो यह 'मरीचि' कहलाता है।
Essence
हम शत्रुओं को समाप्त करके 'मरीचि' बनें। ज्ञान की रुचिवाले, शक्तिसम्पन्न [वृद्धवृष्णः] व यज्ञशील बनें, तभी हमारा जीवन दीस व औरों के लिए आदर्श होगा।
Subject
काश्यप मरीचि' का जीवन