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Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 7/60/4

118 Sukta
7 Mantra
7/60/4
Devata- वास्तोष्पतिः, गृहसमूहः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- रम्यगृह सूक्त
Mantra with Swara
उप॑हूता॒ भूरि॑धनाः॒ सखा॑यः स्वा॒दुसं॑मुदः। अ॑क्षु॒ध्या अ॑तृ॒ष्या स्त॒ गृहा॒ मास्मद्बि॑भीतन ॥

उप॑ऽहूता: । भूरि॑ऽधना: । सखा॑य: । स्वा॒दुऽसं॑मुद: । अ॒क्षु॒ध्या: । अ॒तृ॒ष्या: । स्त॒ । गृहा॑: । मा । अ॒स्मत् । बि॒भी॒त॒न॒ ॥६२.४॥

Mantra without Swara
उपहूता भूरिधनाः सखायः स्वादुसंमुदः। अक्षुध्या अतृष्या स्त गृहा मास्मद्बिभीतन ॥

उपऽहूता: । भूरिऽधना: । सखाय: । स्वादुऽसंमुद: । अक्षुध्या: । अतृष्या: । स्त । गृहा: । मा । अस्मत् । बिभीतन ॥६२.४॥

Meaning
१. (भूरिधना:) = पालक व पोषक धन से युक्त (गृहा:) = घर (उपहूता:) = हमारे द्वारा प्रार्थित हुए हैं। प्रभु हमें ऐसे घरों को प्राप्त कराएँ जहाँ कि आवश्यक धन की कमी न हो, (सखायः) = जिस घर में रहनेवाले लोग परस्पर मित्रभाववाले हों [सखे ससपदी भव], (स्वादुसंमुदः) = ये घर स्वादिष्ट पदार्थों से प्रसन्नता को प्राप्त करानेवाले हों। (अक्षुध्याः अतष्याः स्त) = हे गृहो! आप भूखे और प्यासे ही न रह जाओ, अर्थात् घरों में खान-पान की कमी न हो। हे (गृहा:) = घर के लोगो! (अस्मत् मा बिभीतन) = हमसे भयभीत मत होवो, अर्थात् गृहपति का स्वभाव ऐसा मधुर हो कि उसके आने पर सब प्रसन्नता का अनुभव करें।
Essence
हम उन घरों के लिए प्रार्थना करते हैं जो पर्याप्त धनवाले हैं, जहाँ लोग परस्पर मित्रभाव से रहते हैं, जहाँ स्वादिष्ट पदार्थ हर्ष का कारण बनते हैं, जहाँ लोग न भूखे हैं न प्यासे।
Subject
'भूरिधनाः स्वादुसंमुदः' गृहा:

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