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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 7/58/2

118 Sukta
2 Mantra
7/58/2
Devata- इन्द्रावरुणौ Rishi- कौरूपथिः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- अन्न सूक्त
Mantra with Swara
इन्द्रा॑वरुणा मधुमत्तमस्य॒ वृष्णः॒ सोम॑स्य वृष॒णा वृ॑षेथाम्। इ॒दं वा॒मन्धः॒ परि॑षिक्तमा॒सद्या॒स्मिन्ब॒र्हिषि॑ मादयेथाम् ॥

इन्द्रा॑वरुणा । मधु॑मत्ऽतमस्य । वृष्ण॑: । सोम॑स्य । वृ॒ष॒णा॒ । आ । वृ॒षे॒था॒म् । इ॒दम् । वा॒म् । अन्ध॑: । परि॑ऽसिक्तम् । आ॒ऽसद्य॑: । अ॒स्मिन् । ब॒र्हिषि॑ । मा॒द॒ये॒था॒म् ॥६०.२॥

Mantra without Swara
इन्द्रावरुणा मधुमत्तमस्य वृष्णः सोमस्य वृषणा वृषेथाम्। इदं वामन्धः परिषिक्तमासद्यास्मिन्बर्हिषि मादयेथाम् ॥

इन्द्रावरुणा । मधुमत्ऽतमस्य । वृष्ण: । सोमस्य । वृषणा । आ । वृषेथाम् । इदम् । वाम् । अन्ध: । परिऽसिक्तम् । आऽसद्य: । अस्मिन् । बर्हिषि । मादयेथाम् ॥६०.२॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. हे (इन्द्रावरुणा) = जितेन्द्रिय व वासनाओं का निवारण करनेवाले पुरुषो! आप इस (मधुमत्तस्य) = जीवन को अत्यन्त मधुर बनानेवाले (वृष्णा:) = शक्तिशाली (सोमस्य) = सोम का वृषेथाम् शरीर में ही सेचन करो। आप (वृषणा) = सोमरक्षण द्वारा शक्तिशाली बनते हो। २. (इदम्) = यह सोम (वाम् अन्धः) = आपका भोजन है, (परिषिक्तम्) = यह शरीर में चारों ओर सिक्त हुआ है। अब आप (अस्मिन्) = इस (बर्हिषि) = [बृह उद्यमने] जिसमें से वासनाओं का उर्हण कर दिया गया है, उस हृदय में (आसद्य) = आसीन होकर, अर्थात् पवित्र हृदय में प्रभु का ध्यान करते हुए (मादयेथाम्) = आनन्दित होवो।
Essence
इन्द्र और वरुण इस मधुमत्तम सोम का पान करते हुए शक्तिशाली बनते हैं। यह सोम उनका भोजन हो जाता है। इसी दृष्टि से वे पवित्र हृदय में प्रभु का प्रात:-सायं ध्यान करते सोमरक्षण द्वारा यह 'बादरायणि' बनता है, [बद to be steady or firm]-अपने मार्ग पर दृढ़ता से चलनेवाला। यह बादरायणि औरों के आक्रोश की चिन्ता न करता हुआ मार्ग पर दृढ़ता से आगे बढ़ता है। यही अगले सूक्त का ऋषि है -
Subject
'मधुमत्तम' सोम