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Atharvaveda - Mantra 6

Atharvaveda 7/56/6

118 Sukta
8 Mantra
7/56/6
Devata- वृश्चिकादयः Rishi- अथर्वा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- विषभेषज्य सूक्त
Mantra with Swara
न ते॑ बा॒ह्वोर्बल॑मस्ति॒ न शी॒र्षे नोत म॑ध्य॒तः। अथ॒ किं पा॒पया॑ऽमु॒या पुच्छे॑ बिभर्ष्यर्भ॒कम् ॥

न । ते॒ । बा॒ह्वो: । बल॑म् । अ॒स्ति॒ । न । शी॒र्षे । न । उ॒त । म॒ध्य॒त: । अथ॑ । किम् । पा॒पया॑ । अ॒मु॒या । पुच्छे॑ । बि॒भ॒र्षि॒ । अ॒र्भ॒कम् ॥५८.६॥

Mantra without Swara
न ते बाह्वोर्बलमस्ति न शीर्षे नोत मध्यतः। अथ किं पापयाऽमुया पुच्छे बिभर्ष्यर्भकम् ॥

न । ते । बाह्वो: । बलम् । अस्ति । न । शीर्षे । न । उत । मध्यत: । अथ । किम् । पापया । अमुया । पुच्छे । बिभर्षि । अर्भकम् ॥५८.६॥

Meaning
१. हे पुच्छ से डसनेवाले वृश्चिक! (ते बह्वो: बलं न अस्ति) = तेरी भुजाओं में बल नहीं है। (न शीर्षे) = न सिर में बल है, (उत) = और (न मध्यत:) = तेरे मध्यभाग [उदर] में भी बल नहीं है। (अथ) = अब (किम्) = क्यों (अमुय पापया) = इस पापिष्ठ, पर-पीड़ाकारिणी बुद्धि से (अर्भकम्) = इस अत्यल्प विष को (पुच्छे बिभर्षि) = पूँछ में धारण किये हुए है। तू तो व्यर्थ में ही पर-पीड़ा करने का यत्न करता है।
Essence
बिच्छू व्यर्थ में पर-पीड़ाकारी विष को पूछ में धारण करता है। इसी प्रकार कई मनुष्य भी सामने नहीं अपितु पीठ पीछे कुछ निन्दा करते रहते हैं, वे वृश्चिक के समान ही है।
Subject
पुच्छदंशी वृश्चिक

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