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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 7/56/3

118 Sukta
8 Mantra
7/56/3
Devata- वृश्चिकादयः Rishi- अथर्वा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- विषभेषज्य सूक्त
Mantra with Swara
यतो॑ द॒ष्टं यतो॑ धी॒तं तत॑स्ते॒ निर्ह्व॑यामसि। अ॒र्भस्य॑ तृप्रदं॒शिनो॑ म॒शक॑स्यार॒सं वि॒षम् ॥

यत॑: । द॒ष्टम् । यत॑: । धी॒तम् । तत॑: । ते॒ । नि: । ह्व॒या॒म॒सि॒ । अ॒र्भस्य॑ । तृ॒प्र॒ऽदं॒शिन॑: । म॒शक॑स्य । अ॒र॒सम् । वि॒षम् ॥५८.३॥

Mantra without Swara
यतो दष्टं यतो धीतं ततस्ते निर्ह्वयामसि। अर्भस्य तृप्रदंशिनो मशकस्यारसं विषम् ॥

यत: । दष्टम् । यत: । धीतम् । तत: । ते । नि: । ह्वयामसि । अर्भस्य । तृप्रऽदंशिन: । मशकस्य । अरसम् । विषम् ॥५८.३॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. विष-दष्ट पुरुष को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि (यतः दष्टम्) = जिस स्थान में सादि से डसा गया है, (यतः धीतम्) = जिस स्थान में सादि से रुधिर पिया गया है। हे सर्पदष्ट पुरुष! (तत्) = वहाँ से (ते) = तेरे इस विष को (निर्ह्रयामसि) = पुकार कर बाहर करते हैं। २. इस (अर्भस्य) = छोटे से (तप्रदंशिन:) = शीघ्रता से काटनेवाले व तीव्रता से काटनेवाले (मशकस्य) = मच्छर का (विषं अरसम्) = विष तो निवीर्य ही है [शंगारादौ रसे वीर्य गुणे रागे द्रवे रस:] इस विष को दूर करना कठिन है ही नहीं।
Essence
जहाँ सर्प काटता है और रुधिर पीता है, उस अंग से हम विष को पुकार कर बाहर करते हैं। इस छोटे-से तीव्रता से काटनेवाले मच्छर का विष तो निर्वीर्य ही है।
Subject
सर्पविष-निराकरण