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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 7/52/2

118 Sukta
2 Mantra
7/52/2
Devata- सांमनस्यम्, अश्विनौ Rishi- अथर्वा Chhanda- जगती Suktam- सांमनस्य सूक्त
Mantra with Swara
सं जा॑नामहै॒ मन॑सा॒ सं चि॑कि॒त्वा मा यु॑ष्महि॒ मन॑सा॒ दैव्ये॑न। मा घोषा॒ उत्स्थु॑र्बहु॒ले वि॒निर्ह॑ते॒ मेषुः॑ पप्त॒दिन्द्र॒स्याह॒न्याग॑ते ॥

सम् । जा॒ना॒म॒है॒ । मन॑सा । सम् । चि॒कि॒त्वा । मा । यु॒ष्म॒हि॒ । मन॑सा । दैव्ये॑न । मा । घोषा॑: । उत् । स्थु॒: । ब॒हु॒ले । वि॒ऽनिर्ह॑ते । मा । इषु॑: । प॒प्त॒त् । इन्द्र॑स्य । अह॑नि । आऽग॑ते ॥५४.२॥

Mantra without Swara
सं जानामहै मनसा सं चिकित्वा मा युष्महि मनसा दैव्येन। मा घोषा उत्स्थुर्बहुले विनिर्हते मेषुः पप्तदिन्द्रस्याहन्यागते ॥

सम् । जानामहै । मनसा । सम् । चिकित्वा । मा । युष्महि । मनसा । दैव्येन । मा । घोषा: । उत् । स्थु: । बहुले । विऽनिर्हते । मा । इषु: । पप्तत् । इन्द्रस्य । अहनि । आऽगते ॥५४.२॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (मनसा) = मन के द्वारा हम (संजानामहै) = समान विचारवाले हों तथा (चिकित्वा) = [चिकित्वना] ज्ञान से भी हम (सम्) = संज्ञानवाले हों। हमारे मन व बुद्धि हमें संज्ञान की ओर ले-चलें। हम (दैव्येन मनसा) = दिव्य गुणवाले मन से (मा युष्महि) = कभी पृथक् न हों। २. (बहुले) = [बहुल The dark half of month] कृष्णपक्ष के अन्धकार के (विनिहते) = नष्ट कर दिये जाने पर (घोषा:) = अन्धकार में होनेवाली ध्वनियों (मा उत्स्थ:) = न उठें, अर्थात् राष्ट्र में न्याय व्यवस्था के ठीक होने से प्रकाश ही-प्रकाश हो, लोगों में हाहाकार न मचता रहे और (अहनि आगते) = दिन निकलने पर (इन्द्रस्य इषुः) = [अशनि:]-अशनिरूपा (मर्मभेदिनी) = परकीया वाक् (मा पासत्) = हमपर न गिरे। वैमनस्य के कारण दूसरों की कठोर वाणियों हमपर न गिरें, हम परस्पर अनुकूल वाणीवाले हों।
Essence
हम मन व बुद्धि से परस्पर संज्ञानवाले हों। हमारा मन दिव्य हो। हमारे राष्ट्र से अन्धकार दूर हो, हाहाकार न होता रहे और हमपर विद्युत् के समान मर्मभेदिनी वाणियों न गिरें।

इसप्रकार संज्ञानवाला यह व्यक्ति 'ब्रह्मा' [बड़ा] बनता है। अगले दो सूक्तों का ऋषि ब्रह्मा ही है -
Subject
'मन व बुद्धि' से परस्पर ऐक्य