Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Atharvaveda - Mantra 9

Atharvaveda 7/50/9

118 Sukta
9 Mantra
7/50/9
Devata- इन्द्रः Rishi- अङ्गिराः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- विजय सूक्त
Mantra with Swara
अक्षाः॒ फल॑वतीं॒ द्युवं॑ द॒त्त गां क्षी॒रिणी॑मिव। सं मा॑ कृ॒तस्य॒ धार॑या॒ धनुः॒ स्नाव्ने॑व नह्यत ॥

अक्षा॑: । फल॑ऽवतीम् । द्युव॑म् । द॒त्त । गाम् । क्षी॒रिणी॑म्ऽइव । सम् । मा॒ । कृ॒तस्य॑ । धार॑या । धनु॑: । स्नाव्ना॑ऽइव । न॒ह्य॒त॒ ॥५२.९॥

Mantra without Swara
अक्षाः फलवतीं द्युवं दत्त गां क्षीरिणीमिव। सं मा कृतस्य धारया धनुः स्नाव्नेव नह्यत ॥

अक्षा: । फलऽवतीम् । द्युवम् । दत्त । गाम् । क्षीरिणीम्ऽइव । सम् । मा । कृतस्य । धारया । धनु: । स्नाव्नाऽइव । नह्यत ॥५२.९॥

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
१. (अक्षा:) = हे इन्द्रियो! आप मुझे (फलवती धुवम्) = सफल सार्थक व्यवहार को [दिव् व्यवहारे] दत्त-दो। मैं इन्द्रियों से जिन क्रियाओं को करूं, वे सब क्रियाएँ सफल हों। मेरे लिए यह व्यवहार इसप्रकार फलवाला हो (इव) = जैसे (क्षीरिणीं गाम्) = दूधवाली गौ होती है। मुझसे किया गया व्यवहार मेरे लिए दुधारू गौ के समान लाभप्रद हो। २. हे इन्द्रियो! (मा) = मुझे (कृतस्य धारया) = पुरुषार्थ के धारण से इसप्रकार (संनहात) = बाँध दो, (इव) = जैसेकि (धनुः स्नाना) = धनुष को स्नायु-निर्मित डोरी से बाँधते हैं। मेरे इस पुरुषार्थरूपी धनुष का एक सिरा मस्तिष्क हो, दूसरा हृदय। इन दोनों सिरों को कसकर मैं विद्या व श्रद्धा के साथ कर्मरूप तीरों को चलानेवाला बनें।
Essence
मैं इन्द्रियों से सदा उत्तम पुरुषार्थ को सिद्ध करनेवाला बनूं। मैं श्रद्धा और विद्या के साथ कर्म करता हुआ सफल जीवनवाला बनूं।

 
Subject
पुरुषार्थमय जीवन