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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 7/49/2

118 Sukta
2 Mantra
7/49/2
Devata- देवपत्नी Rishi- अथर्वा Chhanda- चतुष्पदा पङ्क्तिः Suktam- देवपत्नी सूक्त
Mantra with Swara
उ॒त ग्ना व्य॑न्तु दे॒वप॑त्नीरिन्द्रा॒ण्यग्नाय्य॒श्विनी॒ राट्। आ रोद॑सी वरुणा॒नी शृ॑णोतु॒ व्यन्तु॑ दे॒वीर्य ऋ॒तुर्जनी॑नाम् ॥

उ॒त । ग्ना: । व्य॒न्तु॒ । दे॒वऽप॑त्नी: । इ॒न्द्रा॒णी । अ॒ग्नायी॑ । अ॒श्विनी॑ ।राट् । आ । रोद॑सी । व॒रु॒णा॒नी । शृ॒णो॒तु॒ । व्यन्तु॑ । दे॒वी: । य: । ऋ॒तु: । जनी॑नाम् ॥५१.२॥

Mantra without Swara
उत ग्ना व्यन्तु देवपत्नीरिन्द्राण्यग्नाय्यश्विनी राट्। आ रोदसी वरुणानी शृणोतु व्यन्तु देवीर्य ऋतुर्जनीनाम् ॥

उत । ग्ना: । व्यन्तु । देवऽपत्नी: । इन्द्राणी । अग्नायी । अश्विनी ।राट् । आ । रोदसी । वरुणानी । शृणोतु । व्यन्तु । देवी: । य: । ऋतु: । जनीनाम् ॥५१.२॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (उत) = और ये देवपत्नी:-[देवपतयो यासां ता:] दिव्यवृत्तिवाले पुरुषों की पलियाँ (ग्नाः व्यन्तु) = इन वेदवाणियों की कामना करें [कामयन्ताम् अश्नन्तु वा] ये वेदवाणियाँ ही इनका अध्यात्म भोजन बनें। ये (इन्द्राणी) = इन्द्र की पत्नी, जितेन्द्रिय पुरुष की पत्नी (अग्नायी) = अग्नि की पत्नी, प्रगतिशील पुरुष की पत्नी, (अश्विनी) = [अश्विनो जाया] प्राणापान के साधक पुरुष की पत्नी, राट्-राजन्ती, दीस जीवनवाली हो। २. यह (रोदसी) [रुद्रस्य जाया]= रुद्र की पत्नी, रोगों को दूर भगानेवाले पुरुष की पत्नी तथा (वरुणानी) = पापों का निवारण करनेवाले श्रेष्ठ पुरुष की पत्नी (आशणोतु) = सदा इन वेदवाणियों को सुनें तथा (देवी:) = ये दिव्य गुणोंवाली स्त्रियाँ (यः जनीनां ऋतः) = जो जायाओं का [सन्तान को जन्म देनेवाली स्त्रियों का] काल है, उस समय (व्यन्तु) = वेदवाणियों की कामना करें। गर्भ में सन्तान की वृद्धि करनेवाली ये स्त्रियाँ यदि इस समय इन वाणियों को सुनेंगी तो 'इन्द्र, अग्नि, अश्विन, रुद्र व वरुण' के गुणों से युक्त सन्तानों को जन्म देनेवाली होंगी।
Essence
दिव्यगुणों को धारण करनेवाले पुरुषों की पत्नियाँ वेदवाणियों की कामना करती हुई 'जितेन्द्रिय, प्रगतिशील, प्राणशक्ति-सम्पन्न, नीरोग व निष्पाप जीवनवाली' सन्तानों को जन्म देंगी।

उत्तम माता से जन्म लेनेवाली यह सन्तान 'अङ्गिरा:'-अंग-प्रत्यंग में रसवाली-शक्तिशाली होती है। 'अङ्गिराः' ही अगले दो सूक्तों का ऋषि है -
Subject
ग्ना: व्यन्तु