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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 7/48/2

118 Sukta
2 Mantra
7/48/2
Devata- राका Rishi- अथर्वा Chhanda- जगती Suktam- राका सूक्त
Mantra with Swara
यास्ते॑ राके सुम॒तयः॑ सु॒पेश॑सो॒ याभि॒र्ददा॑सि दा॒शुषे॒ वसू॑नि। ताभि॑र्नो अ॒द्य सु॒मना॑ उ॒पाग॑हि सहस्रापो॒षं सु॑भगे॒ ररा॑णा ॥

या: । ते॒ । रा॒के॒ । सु॒ऽम॒तय॑: । सु॒ऽपेश॑स: । याभि॑: । ददा॑सि । दा॒शुषे॑ । वसू॑नि । ताभि॑: । न॒: । अ॒द्य । सु॒ऽमना॑: । उ॒प॒ऽआग॑हि । स॒ह॒स्र॒ऽपो॒षम् । सु॒ऽभ॒गे॒ । ररा॑णा॥५०.२॥

Mantra without Swara
यास्ते राके सुमतयः सुपेशसो याभिर्ददासि दाशुषे वसूनि। ताभिर्नो अद्य सुमना उपागहि सहस्रापोषं सुभगे रराणा ॥

या: । ते । राके । सुऽमतय: । सुऽपेशस: । याभि: । ददासि । दाशुषे । वसूनि । ताभि: । न: । अद्य । सुऽमना: । उपऽआगहि । सहस्रऽपोषम् । सुऽभगे । रराणा॥५०.२॥

Meaning
१. हे (राके) = पूर्णचन्द्रवत् शुभानने ! अथवा सब-कुछ प्राप्त करानेवाली [रा दाने] गृहपत्नि! (याः) = जो (ते) = तेरी (समतयः) = उत्तम मतियाँ हैं, वे (सुपेशस:) = उत्तम सौन्दर्य का निर्माण करनेवाली हैं, (याभि:) = जिन सुमतियों से दाशुषे तेरे लिये आवश्यक धनों को प्राप्त करानेवाले इस पति के लिए तू (वसूनि) = निवास के लिए आवश्यक सब पदार्थों को (ददासि) = देती है। पति धन प्राप्त कराता है, पत्नी उस धन का सदुपयोग करती हुई वसुओं को उपस्थित करती है। २. (ताभिः) = उन समतियों के साथ (अद्य) = आज (समना:) = प्रशस्त मनवाली होती हुई तू (नः उपागहि) = हमें समीपता से प्राप्त हो। हे (सुभगे) = उत्तम सौभाग्यसम्पन्न पनि! तू (सहस्त्रापोर्ष राणा) = हज़ारों प्रकार से पोषणों को प्राप्त करानेवाली हो और सुभगा होती हुई इस घर को सौभाग्यसम्पन्न बना।
Essence
पत्नी को पूर्ण चन्द्रमा के समान शोभावाला होना चाहिए। वह अपनी उत्तम मतियों से सब वसुओं को जुटानेवाली हो। उसके कारण घर सब प्रकार से पोषण को प्राप्त हो।


 
Subject
सुपेशसः 'सुमतयः'

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