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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 7/47/2

118 Sukta
2 Mantra
7/47/2
Devata- कुहूः Rishi- अथर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- कुहू सूक्त
Mantra with Swara
कु॒हूर्दे॒वाना॑म॒मृत॑स्य॒ पत्नी॒ हव्या॑ नो अस्य ह॒विषो॑ जुषेत। शृ॑णोतु य॒ज्ञमु॑श॒ती नो॑ अ॒द्य रा॒यस्पोषं॑ चिकि॒तुषी॑ दधातु ॥

कु॒हू: । दे॒वाना॑म् । अ॒मृत॑स्य । पत्नी॑ । हव्या॑ । न॒: । अ॒स्य॒ । ह॒विष॑: । जु॒षे॒त॒ । शृ॒णोतु॑ । य॒ज्ञम् । उ॒श॒ती । न॒: । अ॒द्य । रा॒य: । पोष॑म् । चि॒कि॒तुषी॑ । द॒धा॒तु॒ ॥४९.२॥

Mantra without Swara
कुहूर्देवानाममृतस्य पत्नी हव्या नो अस्य हविषो जुषेत। शृणोतु यज्ञमुशती नो अद्य रायस्पोषं चिकितुषी दधातु ॥

कुहू: । देवानाम् । अमृतस्य । पत्नी । हव्या । न: । अस्य । हविष: । जुषेत । शृणोतु । यज्ञम् । उशती । न: । अद्य । राय: । पोषम् । चिकितुषी । दधातु ॥४९.२॥

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Meaning
१. (कुहू:) = अपनी कार्यकुशलता से सबको विस्मित करनेवाली, (देवानाम्) = दिव्य गुणों का तथा (अमृतस्य) = नीरोगता का (पत्नी) = रक्षण करनेवाली यह (हव्या) = पुकारने योग्य व प्रभु का आह्वान करने में उत्तम पत्नी (न:) = हमारी (अस्य हविष:) = इस हवि का जुषेत-प्रीतिपूर्वक सेवन करनेवाली हो। यह यज्ञशील हो। २. (यज्ञं उशती) = यज्ञों की कामना करती हुई, यह (नः शृणोतु) = हमारी पुकार को सुने और (चिकितुषी) = समझदार होती हुई (अद्य) = आज (रायस्पोषं दधातु) = हमारे लिए धनों का पोषण करे।
Essence
उत्तम गृहपत्नी वही है जो 'कार्यकुशलता, दिव्यगुणों व नीरोगता को धारण करनेवाली तथा प्रभस्तवन की वृत्तिवाली है। यह यज्ञों का सेवन करती हुई प्रभु की पुकार को सदा स्मरण करे। यह हमारे लिए धनों का पोषण करे।
Subject
देवानाम् अमृतस्य पत्नी