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Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 7/41/1

118 Sukta
2 Mantra
7/41/1
Devata- श्येनः Rishi- प्रस्कण्वः Chhanda- जगती Suktam- सुपर्ण सूक्त
Mantra with Swara
अति॒ धन्वा॒न्यत्य॒पस्त॑तर्द श्ये॒नो नृ॒चक्षा॑ अवसानद॒र्शः। तर॒न्विश्वा॒न्यव॑रा॒ रजां॒सीन्द्रे॑ण॒ सख्या॑ शि॒व आ ज॑गम्यात् ॥

अति॑ । धन्वा॑नि । अति॑ । अ॒प: । त॒त॒र्द॒ । श्ये॒न: । नृ॒ऽचक्षा॑: । अ॒व॒सा॒न॒ऽद॒र्श: । तर॑न् । विश्वा॑नि । अव॑रा । रजां॑सि । इन्द्रे॑ण । सख्या॑ । शि॒व: । आ । ज॒ग॒म्या॒त् ॥४२.१॥

Mantra without Swara
अति धन्वान्यत्यपस्ततर्द श्येनो नृचक्षा अवसानदर्शः। तरन्विश्वान्यवरा रजांसीन्द्रेण सख्या शिव आ जगम्यात् ॥

अति । धन्वानि । अति । अप: । ततर्द । श्येन: । नृऽचक्षा: । अवसानऽदर्श: । तरन् । विश्वानि । अवरा । रजांसि । इन्द्रेण । सख्या । शिव: । आ । जगम्यात् ॥४२.१॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. वे प्रभु (धन्वानि) = मरुदेशों को (अति) = अतिक्रान्त करके (अपः अतिततर्द) = जलों को अतिशयेन खोल देते हैं। निरुदक प्रदेशों में भी वृष्टि की व्यवस्था करते हैं। (श्वेनः) = वे शंसनीय गतिवाले हैं, (नृचक्षा:) = सब मनुष्यों को देखनेवाले, उनके कर्मों के साक्षी हैं. (अवसानदर्श:) = [अवसीयते निश्चीयते इति अवसानं कर्मफलम्] कर्मफल को दिखलानेवाले हैं, सबको कर्मानुसार फल देनेवाले हैं। २. (विश्वानि) = सब (अबरा रजांसि) = निचले लोकों को (तरन्) = [तारयन्] पार कराता हुआ (शिव:) = वह कल्याणकारी प्रभु (सख्या इन्द्रेण) = मित्रभूत जितेन्द्रिय पुरुष को (आजगम्यात्) = प्राप्त होता है। सखा इन्द्र के साथ प्रभु का मेल हो। प्रभु हमें निचले लोकों से ऊपर उठाएँ, हमें जितेन्द्रिय बनने का सामर्थ्य दें और हमें प्राप्त हों।
Essence
प्रभु हमारे कल्याण के लिए निरुदक प्रदेशों में भी वृष्टि की व्यवस्था करते हैं। वे प्रशंसनीय गतिवाले प्रभु हमारे कर्मों के साक्षी व कर्मफल प्रदाता हैं। वे हमें निचले लोकों से तराते हुए तथा जितेन्द्रिय बनने का सामर्थ्य देते हुए प्राप्त हों।
Subject
श्येनः, अवसानदर्श: