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Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 7/4/1

118 Sukta
1 Mantra
7/4/1
Devata- वायुः Rishi- अथर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- विश्वप्राण सूक्त
Mantra with Swara
एक॑या च द॒शभि॑श्च सुहुते॒ द्वाभ्या॑मि॒ष्टये॑ विंश॒त्या च॑। ति॒सृभि॑श्च॒ वह॑से त्रिं॒शता॑ च वि॒युग्भि॑र्वाय इ॒ह ता वि मु॑ञ्च ॥

एक॑या । च॒ । द॒शभि॑: । च॒ । सु॒ऽहु॒ते॒ । द्वाभ्या॑म् । इ॒ष्टये॑ । विं॒श॒त्या । च॒ । ति॒सृऽभि॑: । च॒ । वह॑से । त्रिं॒शता॑ । च॒ । वि॒युक्ऽभ‍ि॑: । वा॒यो॒ इति॑ । इ॒ह । ता: । वि । मु॒ञ्च॒ ॥४.१॥

Mantra without Swara
एकया च दशभिश्च सुहुते द्वाभ्यामिष्टये विंशत्या च। तिसृभिश्च वहसे त्रिंशता च वियुग्भिर्वाय इह ता वि मुञ्च ॥

एकया । च । दशभि: । च । सुऽहुते । द्वाभ्याम् । इष्टये । विंशत्या । च । तिसृऽभि: । च । वहसे । त्रिंशता । च । वियुक्ऽभ‍ि: । वायो इति । इह । ता: । वि । मुञ्च ॥४.१॥

Meaning
१.हे (वायो) = आत्मन्! [वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तर शरीरम्]! तू इस शरीर में (सुहते) = जिसमें चारों ओर प्रभु के उत्तम दान विद्यमान हैं, (एकया च दशभिः च) = एक और दस, अर्थात् ११ पृथिवीस्थ देवताओं के अंशों से, (द्वाभ्यां विंशत्या च) = दो और बीस, अर्थात् पृथिवीस्थ और अन्तरिक्षस्थ बाईस देवांशों से (तिसृभिः च त्रिंशता च) = तीन और तीस, अर्थात प्रथिवी, अन्तरिक्ष व धुलोकस्थ देवताओं से [ये अन्तरिक्ष एकादशस्थ ये पृथिव्यामेकादशस्थ ये दिव्येकादशस्थ०] जो इस शरीररथ की (वियुग्भि:) = [विशेषेण युज्यन्ते रथे] बड़वाएँ हैं, उनसे वहसे इस शरीर-रथ का मार्ग पर वहन करता है। २. तू इसप्रकार इनके द्वारा रथ का वहन कर कि यात्रा को पूर्ण करके (ता:) = उन्हें (इह) = यहाँ ही (विमुञ्च) = खोल देवे । जीवन-यात्रा को पूर्ण कर लेने से उनकी आवश्यकता ही न रह जाए। प्रभु शरीर-रथ को इस यात्रा की पूर्ति के लिए ही तो देते हैं, और इसमें सब देवांशों का स्थापन करते हैं ('सर्वा ह्यस्मिन्देवता गावो गोष्ठ इवासते')। ये देवांश इस शरीर-रथ के घोड़े हैं। यात्रा पूर्ण हुई और ये अनावश्यक हो गये। यही इनका खोल देना है, यही मुक्ति है।

 
Essence
इस शरीर-रथ में सर्वत्र प्रभु के अद्भुत दान विद्यमान हैं। इस शरीर-रथ में प्रभु ने तेतीस देवताओं के अंशों को घोड़ियों के रूप में जोता है। इस यात्रा को पूर्ण करके हम इसी जीवन में इन्हें खोलनेवाले बनें।

 
Subject
तेतीस बड़वाओं का विमोचन

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