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Atharvaveda - Mantra 5

Atharvaveda 7/38/5

118 Sukta
5 Mantra
7/38/5
Devata- आसुरी वनस्पतिः Rishi- अथर्वा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- केवलपति सूक्त
Mantra with Swara
यदि॒ वासि॑ तिरोज॒नं यदि॑ वा न॒द्यस्तिरः। इ॒यं ह॒ मह्यं॒ त्वामोष॑धिर्ब॒द्ध्वेव॒ न्यान॑यत् ॥

यदि॑। वा॒ । असि॑ । ति॒र॒:ऽज॒नम् । यदि॑ । वा॒ । न॒द्य᳡: । ति॒र: । इ॒यम् । ह॒ । मह्य॑म्। त्वाम् । ओष॑धि: । ब॒ध्द्वाऽइ॑व । नि॒ऽआन॑यत् ॥३९.५॥

Mantra without Swara
यदि वासि तिरोजनं यदि वा नद्यस्तिरः। इयं ह मह्यं त्वामोषधिर्बद्ध्वेव न्यानयत् ॥

यदि। वा । असि । तिर:ऽजनम् । यदि । वा । नद्य: । तिर: । इयम् । ह । मह्यम्। त्वाम् । ओषधि: । बध्द्वाऽइव । निऽआनयत् ॥३९.५॥

Meaning
१. पत्नी कहती है कि हे पते! (यदि वा) = चाहे आप तिरोजनं असि-लोगों से तिरोहित प्रदेश में कहीं हैं, (यदि वा) = अथवा (नद्यः तिर:) = निमगा नदियाँ [आवयोर्व्यवधायिकाः] हममें व्यवधान करनेवाली हैं तो भी (ह) = निश्चय से (इयं ओषधिः) = यह ('प्रेतो मुञ्चतु मा पते: स्वाहा') = इन शब्दों में की गई प्रतिज्ञारूप ओषधि (त्वाम्) = आपको बध्वा (इव) = मानो बाँधकर (महा नि आनयत्) = मरे लिए निरन्तर प्राप्त करानेवाली हो। मेरी यह प्रतिज्ञा आपको मेरे प्रति प्रीतिवाला बनाए।
Essence
पत्नी की पातिव्रत्य की प्रतिज्ञा पति को पत्नी के प्रति प्रेमोन्मुख करनेवाली होती गत मन्त्रों में वर्णित प्रकार से वर्तनवाले पति-पली ही बुद्धिमान हैं। वे 'प्रस्कण्व'-मेधावी हैं। अगले सात सूक्तों का ऋषि यह 'प्रस्कण्व' ही है।
Subject
वैवाहिक प्रतिज्ञा से पति का पत्नी के प्रति झुकाव

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