Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 7/26/2

118 Sukta
8 Mantra
7/26/2
Devata- विष्णुः Rishi- मेधातिथिः Chhanda- त्रिपदा विराड्गायत्री Suktam- विष्णु सूक्त
Mantra with Swara
प्र तद्विष्णु॑ स्तवते वी॒र्याणि मृ॒गो न भी॒मः कु॑च॒रो गि॑रि॒ष्ठाः। प॑रा॒वत॒ आ ज॑गम्या॒त्पर॑स्याः ॥

प्र । तत् । विष्णु॑: । स्त॒व॒ते॒ । वी॒र्या᳡ण‍ि । मृ॒ग: । न । भी॒म: । कु॒च॒र: । गि॒रि॒ऽस्था: । प॒रा॒ऽवत॑: । आ । ज॒ग॒म्या॒त् । पर॑स्या: ॥२७.२॥

Mantra without Swara
प्र तद्विष्णु स्तवते वीर्याणि मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः। परावत आ जगम्यात्परस्याः ॥

प्र । तत् । विष्णु: । स्तवते । वीर्याण‍ि । मृग: । न । भीम: । कुचर: । गिरिऽस्था: । पराऽवत: । आ । जगम्यात् । परस्या: ॥२७.२॥

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
१. (तत्) = [सः] वे सर्वव्यापक [तनु विस्तारे] (विष्णु:) = प्रभु (वीर्याणि) [उदिश्य] = वीर कर्मों का लक्ष्य करके (प्रस्तवते) = खूब ही स्तुति किये जाते हैं। (मृगः) = वे प्रभु ही अन्वेषणीय हैं [मृग अन्वेषणे], (न भीमः) = वे भयंकर नहीं, प्रेम ही भगवान् का रूप है, पापियों को दण्ड भी वे उनके कल्याण के लिए प्रेम से ही देते हैं। (कुचरः) = सम्पूर्ण पृथिवी पर विचरण करनेवाले है अथवा कहाँ नहीं है? [क्वायं न चरतीति वा-नि०] प्रभु तो सर्वत्र हैं। (गिरिष्ठाः) = वेदवाणियों में स्थित हैं, सब वेद प्रभु का ही तो वर्णन कर रहे है [सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति]।२. वे प्रभु (परस्याः परावतः) = दूर-से-दूर होते हुए भी (आजगम्यात्) = हमारे हृदय-देश में आने का अनुग्रह करें। दूर से-दूर विद्यमान उस प्रभु को हम यहाँ हृदय में अनुभव करने का प्रयत्न करें।
Essence
प्रभु के वीरतापूर्ण कर्म स्तुति के योग्य हैं। उन प्रभु का ही हम अन्वेषण करें, वे प्रेमरूप हैं, सर्वत्र हैं, सब वेदमन्त्रों में उनका ही प्रतिपादन हो रहा है। दूर-से-दूर होते हुए भी वे प्रभु हमें यहाँ हदयों में प्राप्त हों।
Subject
कुचरः, गिरिष्ठाः