Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 7/26/1

118 Sukta
8 Mantra
7/26/1
Devata- विष्णुः Rishi- मेधातिथिः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- विष्णु सूक्त
Mantra with Swara
विष्णो॒र्नु कं॒ प्रा वो॑चं वी॒र्याणि॒ यः पार्थि॑वानि विम॒मे रजां॑सि। यो अस्क॑भाय॒दुत्त॑रं स॒धस्थं॑ विचक्रमा॒णस्त्रे॒धोरु॑गा॒यः ॥

विष्णो॑: । नु । क॒म् । प्र । वो॒च॒म् । वी॒र्या᳡णि । य: । पार्थि॑वानि । वि॒ऽम॒मे । रजां॑सि । य: । अस्क॑भायत् । उत्ऽत॑रम् । स॒धऽस्थ॑म् । वि॒ऽच॒क्र॒मा॒ण: । त्रे॒धा । उ॒रु॒ऽगा॒य: ॥२७.१॥

Mantra without Swara
विष्णोर्नु कं प्रा वोचं वीर्याणि यः पार्थिवानि विममे रजांसि। यो अस्कभायदुत्तरं सधस्थं विचक्रमाणस्त्रेधोरुगायः ॥

विष्णो: । नु । कम् । प्र । वोचम् । वीर्याणि । य: । पार्थिवानि । विऽममे । रजांसि । य: । अस्कभायत् । उत्ऽतरम् । सधऽस्थम् । विऽचक्रमाण: । त्रेधा । उरुऽगाय: ॥२७.१॥

Meaning
१. मैं (विष्णो:) = उस सर्वव्यापक प्रभु के वीर्याणि वीरतायुक्त कर्मों को (न कम्) = शीघ्र ही (प्रावोचम्) = प्रकर्षेण कहता हूँ। उस विष्णु के (य:) = जिसने इन (पार्थिवानि रजांसि विममे) = पार्थिव लोकों को बनाया है। अथवा इन पार्थिव लोकों में होनेवाली अग्नि, विद्युत, सूर्यात्मक ज्योतियों को [रजासि] बनाया है। २. (य:) = जिस विष्णु ने (उत्तरम्) = उत्कृष्टतर (सधस्थम्) = [सह तिष्ठन्त्यस्मिन् देवा:] प्रभु के साथ मिलकर बैठने के आधारभूत इस स्वर्ग को (अस्कभायत्) = थामा है। वे विष्णु (त्रेधा) = तीन प्रकार से-पृथिवी, अन्तरिक्ष वद्युलोक में (विचक्रमाण:) = विशिष्टरूप से गति करते हुए (उरुगाय:) = खूब ही गायन के योग्य हैं, अथवा सर्वत्र गमनवाले हैं।
Essence
प्रभु के ही सब बीरतापूर्ण कर्म हैं, प्रभु ही सब अग्नि, विद्युत, सूर्यरूप ज्योतियों को निर्मित करते हैं। स्वर्ग को भी वे ही थामनेवाले हैं। पृथिवी, अन्तरिक्ष व धुलोक में गति करते हुए वे प्रभु गायन के योग्य हैं।
Subject
त्रेधा विचक्रमाणः, उरुगाय:

We are thankful to https://vedicscriptures.in for providing us a substantial amount of data for this section of the Vedas.