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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 7/17/2

118 Sukta
4 Mantra
7/17/2
Devata- सविता Rishi- भृगुः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- द्रविणार्थप्रार्थना सूक्त
Mantra with Swara
धा॒ता द॑धातु दा॒शुषे॒ प्राचीं॑ जी॒वातु॒मक्षि॑ताम्। व॒यं दे॒वस्य॑ धीमहि सुम॒तिं वि॒श्वरा॑धसः ॥

धा॒ता । द॒धा॒तु॒ । दा॒शुषे॑ । प्राची॑म् । जी॒वातु॑म् । अक्षि॑ताम् । व॒यम् । दे॒वस्य॑ । धी॒म॒हि॒ । सु॒ऽम॒तिम् । वि॒श्वऽरा॑धस: ॥१८.२॥

Mantra without Swara
धाता दधातु दाशुषे प्राचीं जीवातुमक्षिताम्। वयं देवस्य धीमहि सुमतिं विश्वराधसः ॥

धाता । दधातु । दाशुषे । प्राचीम् । जीवातुम् । अक्षिताम् । वयम् । देवस्य । धीमहि । सुऽमतिम् । विश्वऽराधस: ॥१८.२॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (धाता) = सबका विधारक देव, (दाशुषे) = हवि देनेवाले यजमान के लिए (प्राचीम्) = प्रकृष्ट गमनवाली, उत्तम मार्ग पर ले-चलनेवाली, (जीवातुम्) = जीवनकारिणी, जीवन की औषधभूत (अक्षिताम्) = अनुपक्षीण, क्षीण न होने देनेवाली सम्पत्ति को (दधातु) = हमारे लिए धारण करे। २. (वयम्) = हम (विश्वराधस:) = सब कार्यों को सिद्ध करनेवाले (देवस्य) = प्रकाशमय प्रभु की (सुमतिम्) = कल्याणी मति को (धीमहि) = धारण करते हैं।
Essence
गतमन्त्र से यहाँ प्रथम पाद में 'रयिम्' शब्द का अनुवर्तन है। प्रभु हमें सम्पत्ति दें, जोकि हमारी अग्रगति की साधक हों, जीवन की रक्षक हों तथा हमें क्षीण न होने दें। साथ ही हम प्रभु की सुमति का भी धारण करे, ताकि यह सम्पत्ति हमें विलास की और न ले जाए।
Subject
सुमति