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Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 7/14/4

118 Sukta
4 Mantra
7/14/4
Devata- सविता Rishi- अथर्वा Chhanda- जगती Suktam- सविता सूक्त
Mantra with Swara
दमू॑ना दे॒वः स॑वि॒ता वरे॑ण्यो॒ दध॒द्रत्नं॑ पि॒तृभ्य॒ आयूं॑षि। पिबा॒त्सोमं॑ म॒मद॑देनमि॒ष्टे परि॑ज्मा चित्क्रमते अस्य॒ धर्म॑णि ॥

दमू॑ना: । दे॒व: । स॒वि॒ता । वरे॑ण्य: । दध॑त् । रत्न॑म् । दक्ष॑म् । पि॒तृऽभ्य॑: । आयूं॑षि । पिबा॑त् । सोम॑म् । म॒मद॑त् । ए॒न॒म् । इ॒ष्टे । परि॑ऽज्मा । चि॒त् । क्र॒म॒ते॒ । अ॒स्य॒ । धर्म॑णि ॥१५.४॥

Mantra without Swara
दमूना देवः सविता वरेण्यो दधद्रत्नं पितृभ्य आयूंषि। पिबात्सोमं ममददेनमिष्टे परिज्मा चित्क्रमते अस्य धर्मणि ॥

दमूना: । देव: । सविता । वरेण्य: । दधत् । रत्नम् । दक्षम् । पितृऽभ्य: । आयूंषि । पिबात् । सोमम् । ममदत् । एनम् । इष्टे । परिऽज्मा । चित् । क्रमते । अस्य । धर्मणि ॥१५.४॥

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Meaning
१. (दमूना:) = [दानमना:-नि०] सब अभिलषित पदार्थों को देनेवाला, (देव:) = प्रकाशमय, (सविता) = उत्पादक व प्रेरक, (वरेण्यः) = वरण करने योग्य प्रभु (पितृभ्य:) = रक्षणात्मक कार्यों में प्रवृत्त लोगों के लिए (रत्नम्) = रमणीय धनों को, (दक्षम्) = बल को तथा (आयूंषि) = दीर्घजीवन को (दधत्) = धारण करता है। २. (अस्य धर्मणि) = इस प्रभु के निर्दिष्ट धारणात्मक कमों में प्रवृत्त जीव (सोमं पिबात्) = सोम का शरीर में ही पान करता है, सोम का रक्षण करता है। यह रक्षित सोम (एनं ममदत) = इसे आनन्दित करता है। यह सोमरक्षक पुरुष (इष्टे) = यज्ञों में (परिज्मा चित्) - परितः गन्ता होता हुआ, यज्ञमय जीवनवाला बनता हुआ (एनं क्रमते) = इस प्रभु को प्राप्त होता है।
Essence
प्रभु 'दमूना, देव, सविता, वरेण्य' हैं, वे रक्षणात्मक कार्यों में प्रवृत्त लोगों के लिए 'रमणीय धन, बल व दीर्घजीवन' प्राप्त कराते हैं। प्रभु-निर्दिष्ट धर्मों में प्रवृत्त व्यक्ति [क] सोमरक्षण करता है, यह रक्षित सोम इसे आनन्दित करता है, [ख] यज्ञों में विचरण करता हुआ यह व्यक्ति प्रभु को प्राप्त करता है।

प्रभु-निर्दिष्ट धर्मों में दृढता से चलता हुआ यह सोमरक्षण व यज्ञशीलता से अपने जीवन का उत्तम परिपाक करता है, अत: 'भृगु' कहलाता है। अगले तीन सूक्तों का ऋषि भृगु ही है।
Subject
दानं, दक्ष, आयूंषि