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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 7/14/2

118 Sukta
4 Mantra
7/14/2
Devata- सविता Rishi- अथर्वा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- सविता सूक्त
Mantra with Swara
उ॒र्ध्वा यस्या॒मति॒र्भा अदि॑द्युत॒त्सवी॑मनि। हिर॑ण्यपाणिरमिमीत सु॒क्रतुः॑ कृ॒पात्स्वः ॥

ऊ॒र्ध्वा: । यस्य॑ । अ॒मति॑: । भा: । अदि॑द्युतत् । सवी॑मनि । हिर॑ण्यऽपाणि: । अ॒मि॒मी॒त॒ । सु॒ऽक्रतु॑: । कृ॒पात् । स्व᳡: ॥१५.२॥

Mantra without Swara
उर्ध्वा यस्यामतिर्भा अदिद्युतत्सवीमनि। हिरण्यपाणिरमिमीत सुक्रतुः कृपात्स्वः ॥

ऊर्ध्वा: । यस्य । अमति: । भा: । अदिद्युतत् । सवीमनि । हिरण्यऽपाणि: । अमिमीत । सुऽक्रतु: । कृपात् । स्व: ॥१५.२॥

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Meaning
१. (यस्य) = जिसकी (अमतिः) = [अमनशीला-व्यापनशीला]-चारों और व्याप्त होनेवाली (भा:) = दीप्ति (ऊर्ध्वा) = उत्कृष्ट होती हुई (अदिद्युतत्) = सम्पूर्ण विश्व को द्योतित करती है। २. (सवीमनि) = उस प्रभु की अनुज्ञा में ही (हिरण्यपाणि:) = हितरमणीय किरणरूप हाथोंवाला (सुक्रतुः) = उत्तम शक्तिवाला सूर्य (कृपात्) = अपने सामर्थ्य से (स्वः अमिमीत) = प्रकाश का निर्माण करता है।
Essence
प्रभु की ज्योति से सारा विश्व धोतित होता है। प्रभु की अनुज्ञा में ही सूर्य प्रकाश का निर्माण करता है। यह सूर्य किरणरूप हाथों में सब प्राणदायी तत्वों को लिये हुए हम सबका हित करने में प्रवृत्त है।
Subject
अमतिः भाः