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Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 7/12/4

118 Sukta
4 Mantra
7/12/4
Devata- मनः Rishi- शौनकः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- शत्रुनाशन सूक्त
Mantra with Swara
यद्वो॒ मनः॒ परा॑गतं॒ यद्ब॒द्धमि॒ह वे॒ह वा॑। तद्व॒ आ व॑र्तयामसि॒ मयि॑ वो रमतां॒ मनः॑ ॥

यत् । व॒: । मन॑: । परा॑ऽगतम् । यत् । ब॒ध्दम् । इ॒ह । वा॒ । इ॒ह । वा॒ । तत् । व॒: । आ । व॒र्त॒या॒म॒सि॒ । मयि॑ । व॒: । र॒म॒ता॒म् । मन॑: ॥१३.४॥

Mantra without Swara
यद्वो मनः परागतं यद्बद्धमिह वेह वा। तद्व आ वर्तयामसि मयि वो रमतां मनः ॥

यत् । व: । मन: । पराऽगतम् । यत् । बध्दम् । इह । वा । इह । वा । तत् । व: । आ । वर्तयामसि । मयि । व: । रमताम् । मन: ॥१३.४॥

Meaning
१. सभापति कहता है कि हे सभासदो! यत्-जो वः मन:-आपका मन परागतम्-कहीं दूर गया हुआ है। वा-या यत्-जो आपका मन इह इह वा-इस-इस विषय में, अमुक-अमुक विषय में बद्धम्-बँधा हुआ है, व: आपके तत्-उस मन को आवर्तयामसि-हम सब ओर से लौटाते हैं। हे सभ्यो। वः मन:-आपका मन मयि रमताम्-मुझमें ही रमण करे, अर्थात् यहाँ प्रस्तुत विषय का ही विचार करनेवाला हो।
Essence
सभा में सब सभ्य एकाग्र होकर प्रस्तुत विषय का ही विचार करें। एकाग्र होकर चिन्तन करनेवाला, अडाँवाडोल बृत्तिवाला विद्वान् 'अथर्वा' है [न थर्वति]। यही अगले दो सूक्तों का ऋषि है -
Subject
एकाग्रता से प्रस्तुत विषय का विचार

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