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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 7/115/2

118 Sukta
4 Mantra
7/115/2
Devata- सविता, जातवेदाः Rishi- अथर्वाङ्गिराः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- पापलक्षणनाशन सूक्त
Mantra with Swara
या मा॑ ल॒क्ष्मीः प॑तया॒लूरजु॑ष्टाभिच॒स्कन्द॒ वन्द॑नेव वृ॒क्षम्। अ॒न्यत्रा॒स्मत्स॑वित॒स्तामि॒तो धा॒ हिर॑ण्यहस्तो॒ वसु॑ नो॒ ररा॑णः ॥

या । मा॒ । ल॒क्ष्मी: । प॒त॒या॒लू: । अजु॑ष्टा: । अ॒भि॒ऽच॒स्कन्द॑ । वन्द॑नाऽइव । वृ॒क्षम् । अ॒न्यत्र॑ । अ॒स्मत् । स॒वि॒त॒: । ताम् । इ॒त: । धा॒: । हिर॑ण्यऽहस्त: । वसु॑ । न॒: । ररा॑ण: ॥१२०.२॥

Mantra without Swara
या मा लक्ष्मीः पतयालूरजुष्टाभिचस्कन्द वन्दनेव वृक्षम्। अन्यत्रास्मत्सवितस्तामितो धा हिरण्यहस्तो वसु नो रराणः ॥

या । मा । लक्ष्मी: । पतयालू: । अजुष्टा: । अभिऽचस्कन्द । वन्दनाऽइव । वृक्षम् । अन्यत्र । अस्मत् । सवित: । ताम् । इत: । धा: । हिरण्यऽहस्त: । वसु । न: । रराण: ॥१२०.२॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (या) = जो (पतयालू:) = नीचे गिरानेवाली, दुर्गति की कारणभूत (अजुष्टा) = अप्रिय, निन्द्य (लक्ष्मी:) = लक्ष्मी (मा अभिचस्कन्द) = मुझे अभितः व्याप्त करती है। जो मुझे इसप्रकार व्यास कर लेती है, (इव) = जैसेकि (वन्दना वृक्षम्) = एक लताविशेष वृक्ष को घेर लेती है। अथवा यह पतयालू अजुष्टा लक्ष्मी मेरा इसप्रकार शोषण कर देती है [स्कन्दिर गतिशोषणयोः] जैसेकि अमरबेल वृक्ष का। प्ररूढ़ वन्दन-तरु की शुष्कता प्रसिद्ध ही है। यह लक्ष्मी भी वृक्षरूप मेरे लिए वन्दना लता ही बन जाती है। २. हे (सवितः) = सबके प्रेरक प्रभो! (ताम्) = उस पतयालू लक्ष्मी को (अस्मत्) = हमसे (इत: अन्यत्र) = यहाँ से अन्य देश में (धाः) = स्थापित कीजिए। (हिरण्यहस्त:) = सुवर्णमय हाथोंवाले आप, सुवर्ण को हाथों में लिये हुए आप (न:) = हमारे लिए (वसु) = धन (रराण:) = देनेवाले हो। आप हमें निवास के लिए आवश्यक धन प्राप्त कराइए।
Essence
अन्याय्य धन हमारे शोषण का कारण बनता है। प्रभु उसे हमसे दूर करते हुए, हमारे निवास के लिए आवश्यक पवित्र धनों को प्राप्त कराएँ।
Subject
शोषण की कारणभूत पतयालू लक्ष्मी