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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 7/110/2

118 Sukta
3 Mantra
7/110/2
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- भृगुः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- शत्रुनाशन सूक्त
Mantra with Swara
याभ्या॒मज॑य॒न्त्स्वरग्र॑ ए॒व यावा॑त॒स्थतु॒र्भुव॑नानि॒ विश्वा॑। प्र च॑र्ष॒णी वृष॑णा॒ वज्र॑बाहू अ॒ग्निमिन्द्रं॑ वृत्र॒हणा॑ हुवे॒ऽहम् ॥

याभ्या॑म् । अज॑यन् । स्व᳡: । अग्रे॑ । ए॒व । यौ । आ॒ऽत॒स्थतु॑: । भुव॑नानि । विश्वा॑ । प्रच॑र्षणी॒ इति॒ प्रऽच॑र्षणी । वृष॑णा । वज्र॑बाहू॒ इति॒ वज्र॑ऽबाहू । अ॒ग्निम् । इन्द्र॑म् । वृ॒त्र॒ऽहना॑ । हु॒वे । अ॒हम् ॥११५.२॥

Mantra without Swara
याभ्यामजयन्त्स्वरग्र एव यावातस्थतुर्भुवनानि विश्वा। प्र चर्षणी वृषणा वज्रबाहू अग्निमिन्द्रं वृत्रहणा हुवेऽहम् ॥

याभ्याम् । अजयन् । स्व: । अग्रे । एव । यौ । आऽतस्थतु: । भुवनानि । विश्वा । प्रचर्षणी इति प्रऽचर्षणी । वृषणा । वज्रबाहू इति वज्रऽबाहू । अग्निम् । इन्द्रम् । वृत्रऽहना । हुवे । अहम् ॥११५.२॥

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Meaning
१. (याभ्याम् एव) = जिन अग्नि व इन्द्र के द्वारा ही, प्रकाश व बल के द्वारा ही (स्वः) = स्वर्ग को अग्ने सर्वप्रथम (अजयन्) = जीतते हैं, (यौ) = जो अग्नि और इन्द्र (विश्वा भुवनानि आतस्थतु:) = सब प्राणियों में अधिष्ठित है, प्रकाश व बल ही प्राणियों के आधार हैं। २. ये अग्नि और इन्द्र (प्रचर्षणी) = प्रकर्षेण सबको देखनेवाले हैं, (वृषणा) = ये सुखों का सेचन करनेवाले हैं तथा (वज्रबाहू) = गतिशील व बन के समान दृढ़ भुजाओंवाले हैं। उन (वृत्रहणा) = सब बासनाओं का विनाश करनेवाले (अग्रिम् इन्द्रम्) = अग्नि और इन्द्र को, प्रकाश व बल के देवता को (अहम् हुवे) = मैं पुकारता हूँ। प्रकाश व बल की आराधना करता हुआ मैं वासनाओं से ऊपर उठता हूँ।
Essence
अग्नि और इन्द्र [प्रकाश-बल] स्वर्ग को प्रास कराते हैं, ये सबके आधार बनते हैं, हमारा पालन करते हैं, सुखों का सेचन करते हैं, हमें क्रियाशील व दृढ़ बनाते हैं, हमारी वासनाओं का विनाश करते हैं।
Subject
स्वर्ग के प्रापक 'अग्नि और इन्द्र'