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Atharvaveda - Mantra 6

Atharvaveda 7/109/6

118 Sukta
7 Mantra
7/109/6
Devata- अग्निः Rishi- बादरायणिः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- राष्ट्रभृत सूक्त
Mantra with Swara
संव॑सव॒ इति॑ वो नाम॒धेय॑मुग्रंप॒श्या रा॑ष्ट्र॒भृतो॒ ह्यक्षाः। तेभ्यो॑ व इन्दवो ह॒विषा॑ विधेम व॒यं स्या॑म॒ पत॑यो रयी॒णाम् ॥

सम्ऽव॑सव: । इति॑ । व॒: । ना॒म॒ऽधेय॑म् । उ॒ग्र॒म्ऽप॒श्या: । रा॒ष्ट्र॒ऽभृत॑: । हि । अ॒क्षा: । तेभ्य॑: । व॒: । इ॒न्द॒व॒: । ह॒विषा॑ । वि॒धे॒म॒ । व॒यम् । स्या॒म॒ । पत॑य: । र॒यी॒णाम्॥११४.६॥

Mantra without Swara
संवसव इति वो नामधेयमुग्रंपश्या राष्ट्रभृतो ह्यक्षाः। तेभ्यो व इन्दवो हविषा विधेम वयं स्याम पतयो रयीणाम् ॥

सम्ऽवसव: । इति । व: । नामऽधेयम् । उग्रम्ऽपश्या: । राष्ट्रऽभृत: । हि । अक्षा: । तेभ्य: । व: । इन्दव: । हविषा । विधेम । वयम् । स्याम । पतय: । रयीणाम्॥११४.६॥

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Meaning
१. गतमन्त्र के गन्धर्वो को सम्बोधित करते हुए कहते है कि ('संवसवः' इति वः नामधेयम्) ृ 'संवसवः' यह आपका नाम है, आप उत्तमरूप से मिलकर रहनेवाले या राष्ट्र में प्रजा को बसानेवाले, (उग्रंपश्या:) ृ तेजस्वी दिखनेवाले, (राष्ट्रभृत:) ृ राष्ट्र का धारण करनेवाले तथा (हि) ृ निश्चय से (अक्षा:) ृ [अक्ष पचाद्यच्] व्यवहारकुशल हो। २. हे (इन्दवः) ृ शक्तिशाली गन्धवों! (तेभ्यः वः) = उन आपके लिए हम हविषा (विधेम) = हवि के द्वारा-उचित कर-प्रदान द्वारा आदर प्रकट करें और (वयम्) = हम (रयीणां पतयः स्याम्) = धनों के स्वामी हों। इन गन्धवों से रक्षित हुए हुए हम धनस्वामी बन पाएँ। [गां भूमि धारयन्ति] ये गन्धर्व राष्ट्रभूमि का रक्षण करते हैं। रक्षित राष्ट्र में प्रजाएँ उत्तमता से धनार्जन कर पाती हैं।
Essence
राष्ट्र का धारण करनेवाले गन्धर्व प्रजा को उत्तम निवास प्राप्त कराते हैं, तेजस्वी होते हैं, व्यवहार-कुशल होते हैं। ये प्रजाओं से उचित कर प्रास करते हुए राष्ट्र की ऐसी उत्तम व्यवस्था करते हैं कि राष्ट्र में सभी धन-स्वामी बनते हैं।
Subject
गन्धर्वो का लक्षण