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Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 7/104/1

118 Sukta
1 Mantra
7/104/1
Devata- ब्रहात्मा Rishi- प्रजापतिः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- गौ सूक्त
Mantra with Swara
कः पृश्निं॑ धे॒नुं वरु॑णेन द॒त्तामथ॑र्वणे सु॒दुघां॒ नित्य॑वत्साम्। बृह॒स्पति॑ना स॒ख्यं जुषा॒णो य॑थाव॒शं त॒न्वः कल्पयाति ॥

क: । पृश्नि॑म् । धे॒नुम् । वरु॑णेन । द॒त्ताम् । अथ॑र्वणे । सु॒ऽदुघा॑म् ॥ नित्य॑ऽवत्साम् । बृह॒स्पत‍ि॑ना । स॒ख्य᳡म् । जु॒षा॒ण: । य॒था॒ऽव॒शम् । त॒न्व᳡: । क॒ल्प॒या॒ति॒ ॥१०९.१॥

Mantra without Swara
कः पृश्निं धेनुं वरुणेन दत्तामथर्वणे सुदुघां नित्यवत्साम्। बृहस्पतिना सख्यं जुषाणो यथावशं तन्वः कल्पयाति ॥

क: । पृश्निम् । धेनुम् । वरुणेन । दत्ताम् । अथर्वणे । सुऽदुघाम् ॥ नित्यऽवत्साम् । बृहस्पत‍िना । सख्यम् । जुषाण: । यथाऽवशम् । तन्व: । कल्पयाति ॥१०९.१॥

Meaning
१. 'पृश्नि' का अर्थ निरुक्त में 'संस्प्रष्टो भासा २.१४' इसप्रकार दिया है। ज्ञानदीप्ति से युक्त यह वेद यहाँ 'धेनु' के रूप में कहा गया है। यह धेनु ज्ञानदुग्ध देनेवाली है। सुखसंदोह्य होने से 'सुदुघा' है तथा सदा ही ज्ञानदुग्ध देनेवाली होने से 'नित्यवत्सा' कही गई है। (क:) = वे अनिरुक्त प्रजापति इस (सुदुघाम्) = सुख-संदोह्य, (नित्यवत्साम्) = सदा वत्सवाली [सर्वदा नवप्रसूता], अर्थात् सदा ही ज्ञानदुग्ध देनेवाली (पृश्निम्) = ज्ञानदीसियों के स्पर्शवाली (धेनुम्) = वेदधेनु को वरुणेन पापनिवारण के हेतु से (अथर्वणे) = [अथर्व] स्थिरवृत्तिवाले पुरुष के लिए (दत्ताम्) = दे। २. यह वेदज्ञान को प्राप्त करनेवाला अथर्वा भी (बृहस्पतिना सख्यं जुषाण:) = उस ब्रह्मणस्पति-ज्ञान के स्वामी प्रभु से मित्रता का प्रीतिपूर्वक सेवन करता हुआ (यथावशम्) = इन्द्रियों को वश में करने के अनुपात में (तन्वः कल्पयाति) = शरीरों को सामर्थ्ययुक्त करता है, अर्थात् जितना-जितना जितेन्द्रिय बनता है, उतना-उतना अपने को शक्तिशाली बना पाता है।
Essence
प्रभु स्थिरवृत्तिवाले पुरुष के लिए पापनिवृत्ति के हेतु से इस वेदधेनु को प्राप्त कराते हैं, जोकि सुदुघा है और सदा ही ज्ञानदुग्ध देनेवाली है। प्रभु से प्रीतिपूर्वक मित्रता का स्थापन करते हुए हम जितेन्द्रिय बनकर अपने शरीरों को शक्तिशाली बनाएँ।

जिस स्थिरवृत्तिवाले पुरुष के लिए प्रभु वेदज्ञान देते हैं, वह 'अथवा' ही अगले दोनों सूक्तों का ऋषि है।
Subject
'सुदुघा नित्यवत्सा' धेनु

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