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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 6/99/2

142 Sukta
3 Mantra
6/99/2
Devata- सोमः Rishi- अथर्वा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- कल्याण के लिए यत्न
Mantra with Swara
यो अ॒द्य सेन्यो॑ व॒धो जिघां॑सन्न उ॒दीर॑ते। इन्द्र॑स्य॒ तत्र॑ बा॒हू स॑म॒न्तं परि॑ दद्मः ॥

य: । अ॒द्य । सेन्य॑: । व॒ध: । जिघां॑सन् । न॒: । उ॒त्ऽईर॑ते । इन्द्र॑स्य । तत्र॑ । बा॒हू इति॑ । स॒म॒न्तम् । परि॑ । द॒द्म॒: ॥९९.२॥

Mantra without Swara
यो अद्य सेन्यो वधो जिघांसन्न उदीरते। इन्द्रस्य तत्र बाहू समन्तं परि दद्मः ॥

य: । अद्य । सेन्य: । वध: । जिघांसन् । न: । उत्ऽईरते । इन्द्रस्य । तत्र । बाहू इति । समन्तम् । परि । दद्म: ॥९९.२॥

Meaning
१. (यः) = जो (अद्य) = आज (सेन्य:) = शत्रु-सेना का (वधः) = बध-साधन शस्त्र (नः) = हमें (जिघांसन्) = मारना चाहता हुआ (उदीरते) = उद्गत होता है तो (तत्र) = वहाँ-वध होने के समय (इन्द्रस्य) = शत्र विद्रावक राजा की (बाहू) = भुजाओं को अपनी रक्षा के लिए (समन्तम्) = सब ओर से (परिदमः) = प्राकार की भाँति धारण करते हैं।
Essence
शत्रु के आक्रमण की आशंका होते ही राजा की सैन्यरूप भुजाएँ हमारे रक्षण के लिए चारों ओर उपस्थित हों।
Subject
प्राकारतुल्य राजा की भुजाएँ

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