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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 6/93/2

142 Sukta
3 Mantra
6/93/2
Devata- भवः, शर्वः Rishi- शन्ताति Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- स्वस्त्ययन सूक्त
Mantra with Swara
मन॑सा॒ होमै॒र्हर॑सा घृ॒तेन॑ श॒र्वायास्त्र॑ उ॒त राज्ञे॑ भ॒वाय॑। न॑म॒स्येभ्यो॒ नम॑ एभ्यः कृणोम्य॒न्यत्रा॒स्मद॒घवि॑षा नयन्तु ॥

मन॑सा । होमै॑: । हर॑सा । घृ॒तेन॑ । श॒र्वाय॑ । अस्त्रे॑ । उ॒त ।राज्ञे॑ । भ॒वाय॑ । न॒म॒स्ये᳡भ्य: । नम॑: । ए॒भ्य॒: । कृ॒णो॒मि॒ । अ॒न्यत्र॑ । अ॒स्मत् । अ॒घऽवि॑षा: । न॒य॒न्तु॒ ॥९३.२॥

Mantra without Swara
मनसा होमैर्हरसा घृतेन शर्वायास्त्र उत राज्ञे भवाय। नमस्येभ्यो नम एभ्यः कृणोम्यन्यत्रास्मदघविषा नयन्तु ॥

मनसा । होमै: । हरसा । घृतेन । शर्वाय । अस्त्रे । उत ।राज्ञे । भवाय । नमस्येभ्य: । नम: । एभ्य: । कृणोमि । अन्यत्र । अस्मत् । अघऽविषा: । नयन्तु ॥९३.२॥

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Meaning
१. (मनसा) = मानस संकल्प से (होमैः) = यज्ञों से हरसा-तेजस्विता के सम्पादन से (पतेन) = [घृ दीसि] ज्ञान-दीति से क्रमश: (शर्वाय) = काम आदि शत्रुओं का संहार करनेवाले, (अस्त्रे) = रोगों को परे फेंकनेवाले (उत) = और (राजे) = तेजस्विता से दीप्त (भवाय) = सर्वमहान् ऐश्वर्यशाली प्रभु के लिए तथा (नमस्येभ्यः एभ्यः) = नमस्कार के योग्य इन देवजनों के लिए (नमः कृणोमि) = नमस्कार करता हूँ। २. ये सब (अस्मत्) = हमारे लिए प्रीणित होकर (अघविषा:) = पापरूप विषवाली क्रियाओं को (अन्यत्र) = दूसरे स्थान पर-दूर (नयन्तु) = ले-जाएँ। उस प्रभु का हम 'शर्व, अला, राजा व भव' के रूप में स्मरण करते हुए पापों से बचें।
Essence
हम दृढ़ मानस संकल्प द्वारा काम-क्रोध आदि का संहार करें, यज्ञों द्वारा रोगों को दूर करें, तेजस्विता से अपने जीवन को दीस बनाएँ तथा ज्ञानदौति द्वारा सर्वोत्तम ऐश्वर्यसम्पन्न बनें। देवजनों का आदर करते हुए पापरूप विषवाली क्रियाओं को अपने जीवन से दूर रक्खें।
Subject
शर्वाय, अस्त्र, राजे, भवाय