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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 6/90/3

142 Sukta
3 Mantra
6/90/3
Devata- रुद्रः Rishi- अथर्वा Chhanda- आर्षी भुरिगुष्णिक् Suktam- इषुनिष्कासन सूक्त
Mantra with Swara
नम॑स्ते रु॒द्रास्य॑ते॒ नमः॒ प्रति॑हितायै। नमो॑ विसृ॒ज्यमा॑नायै॒ नमो॒ निप॑तितायै ॥

नम॑: । ते॒ । रु॒द्र॒ । अस्य॑ते । नम॑: । प्रति॑ऽहितायै । नम॑: । वि॒ऽसृ॒ज्यमा॑नायै । नम॑: । निऽप॑तितायै ॥९०.३॥

Mantra without Swara
नमस्ते रुद्रास्यते नमः प्रतिहितायै। नमो विसृज्यमानायै नमो निपतितायै ॥

नम: । ते । रुद्र । अस्यते । नम: । प्रतिऽहितायै । नम: । विऽसृज्यमानायै । नम: । निऽपतितायै ॥९०.३॥

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Meaning
१. (रुद्र) = हे शरवेध द्वारा रुलानेवाले! (अस्यते ते) = फेंकते हुए तेरे लिए (नम:) = नमस्कार हो। हम तुझे दूर से ही छोड़नेवाले बनें, जिससे हमपर बाण न गिरे। (प्रतिहितायै) = धनुष पर जोड़े हुए-चढ़ाये हुए तेरे इषु के लिए (नम:) = नमस्कार हो। (विसुज्यमानायै) = धनुष से प्रेरित किये जाते हुए इस इषु के लिए (नमः) = नमस्कार हो। (निपतितायै) = विसर्जन के पश्चात् लक्ष्य पर गिरे हुए इस बाण के लिए (नमः) = नमस्कार हो।
Essence
सबसे प्रथम तो हम रोग के कारणों को ही दूर करें [अस्यते], जब रोग उत्पन्न होने को हों तभी उन्हें रोकें [प्रतिहितायै], उत्पन्न हो रहे रोगों को रोकें [विसज्यमानायै] और यह आ जाए तो भी इसके दूरी-करण के लिए पूर्ण प्रयत्न करें [निपतितायै]।
Subject
अस्यते प्रतिहिताय, विसृज्यमानायै निपतितायै
Special
सब प्रकार के रोगों को तपस्या की अग्नि में दग्ध करके यह 'भृगु' बनता है। अङ्ग-प्रत्यङ्ग में रसवाला, यह 'अङ्गिरा' होता है। यही अगले सूक्त का ऋषि है।