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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 6/9/3

142 Sukta
3 Mantra
6/9/3
Devata- गोसमूहः Rishi- जमदग्नि Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- कामात्मा सूक्त
Mantra with Swara
यासां॒ नाभि॑रा॒रेह॑णं हृ॒दि सं॒वन॑नं कृ॒तम्। गावो॑ घृ॒तस्य॑ मा॒तरो॒ऽमूं सं वा॑नयन्तु मे ॥

यासा॑म् । नाभि॑: । आ॒ऽरेह॑णम् । हृ॒दि। स॒म्ऽवन॑नम् । कृ॒तम् । गाव॑: । घृ॒तस्य॑ । मा॒तर॑: । अ॒भूम् । सम् । व॒न॒य॒न्तु॒ । मे॒ ॥९.३॥

Mantra without Swara
यासां नाभिरारेहणं हृदि संवननं कृतम्। गावो घृतस्य मातरोऽमूं सं वानयन्तु मे ॥

यासाम् । नाभि: । आऽरेहणम् । हृदि। सम्ऽवननम् । कृतम् । गाव: । घृतस्य । मातर: । अभूम् । सम् । वनयन्तु । मे ॥९.३॥

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Meaning
१. (यासाम्) = जिनका नाभि:-[गह बन्धने] बन्धन भी (आरेहणम्) = आनन्द देनेवाला है, जिसके ह्दि = हृदय में (संवननम्)= प्रेम की सेवा-संभजन (कृतम्) = उत्पन्न की गई है, (अमूम्) = उसे ये (घृतस्य मातर:) = ज्ञानदीप्ति का निर्माण करनेवाली (गावः) = वेदवाणियों में (संवानयन्तु) = मेरे लिए संभक्त करनेवाली हों अथवा घृत का निर्माण करनेवाली ये गौएँ इसे मेरे प्रति प्रीतिवाला बनाएँ। 'ज्ञान की वाणियों में व गौओं की सेवा में लगे रहना' पत्नी को पति के प्रति प्रेमवाला बनाता
Essence
पत्नी का सम्बन्ध आनन्द का जनक है। इनके हृदय में सेवा का भाव होता है। यदि ये ज्ञान की वाणियों व गौओं की सेवा में लगी रहें तो पति-प्रेम में न्यूनता नहीं आती।
Subject
नाभिः आरेहणं हदि संवननम्
Special
पति-पत्नी का पारस्परिक प्रेम घर में शान्ति का विस्तार करता है, अत: अगले सूक्त का ऋषि शन्ताति' है।