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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 6/88/3

142 Sukta
3 Mantra
6/88/3
Devata- ध्रुवः Rishi- अथर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- ध्रुवोराजा सूक्त
Mantra with Swara
ध्रु॒वोऽच्यु॑तः॒ प्र मृ॑णीहि॒ शत्रू॑न्छत्रूय॒तोऽध॑रान्पादयस्व। सर्वा॒ दिशः॒ संम॑नसः स॒ध्रीची॑र्ध्रु॒वाय॑ ते॒ समि॑तिः कल्पतामि॒ह ॥

ध्रु॒व: । अच्यु॑त: । प्र । मृ॒णी॒हि॒ । शत्रू॑न् । श॒त्रु॒ऽय॒त: । अध॑रान् । पा॒द॒य॒स्व॒ । सर्वा॑: । दिश॑: । सम्ऽम॑नस: । स॒ध्रीची॑: । ध्रु॒वाय॑। ते॒ । सम्ऽइ॑ति: : । क॒ल्प॒ता॒म् । इ॒ह ॥८८.३॥

Mantra without Swara
ध्रुवोऽच्युतः प्र मृणीहि शत्रून्छत्रूयतोऽधरान्पादयस्व। सर्वा दिशः संमनसः सध्रीचीर्ध्रुवाय ते समितिः कल्पतामिह ॥

ध्रुव: । अच्युत: । प्र । मृणीहि । शत्रून् । शत्रुऽयत: । अधरान् । पादयस्व । सर्वा: । दिश: । सम्ऽमनस: । सध्रीची: । ध्रुवाय। ते । सम्ऽइति: : । कल्पताम् । इह ॥८८.३॥

Meaning
१. हे राजन्। (ध्रुवः) = इस राष्ट्र में स्थिर (अच्युत:) = मार्ग से विचलित न होनेवाला होता हुआ (शत्रुन्) = शत्रुओं को (प्रमृणीहि) = नष्ट कर डाल । (शत्रूयत:) = शत्रु की भाँति आचरण करते हुए अन्य जनों को (अधरान् पादयस्व) = नीचे गिरा दे, पददलित कर दे। २. इसप्रकार शत्रुओं के न रहने पर (सर्वाः दिश:) = सब दिशाएँ-इनमें रहनेवाली प्रजाएँ (संमनसः) = उत्तम मनवाली होती हुई (सधीची:) = मिलकर चलनेवाली हों। प्रजाओं का परस्पर विरोध न हो। (इह) = इस राष्ट्र में (ध्रुवायते) = कर्तव्य-पथ में स्थित तेरे लिए (समितिः कल्पताम्) = राष्ट्रसभा समर्थ हो, सामर्थ्य की जनक हो। यह सभा तुझे ध्रुवता से शासन करने में समर्थ करे।
Essence
राजा राष्ट्र को शत्रुभय से रहित करे। इस निरुपद्रव राष्ट्र में सब प्रजाएँ प्रेम से मिलकर चलें। राष्ट्रसभा राजा को शासनकार्य में शक्तिसम्पन्न करे।
Subject
निरुपद्रव राष्ट्र में मिलकर चलनेवाली प्रजाएँ

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