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Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 6/86/1

142 Sukta
3 Mantra
6/86/1
Devata- एकवृषः Rishi- अथर्वा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- वृषकामना सूक्त
Mantra with Swara
वृषेन्द्र॑स्य॒ वृषा॑ दि॒वो वृषा॑ पृथि॒व्या अ॒यम्। वृषा॒ विश्व॑स्य भू॒तस्य॒ त्वमे॑कवृ॒षो भ॑व ॥

वृषा॑ । इन्द्र॑स्य । वृषा॑ । दि॒व: । वृषा॑ । पृ॒थि॒व्या: । अ॒यम् । वृषा॑ । विश्व॑स्य । भू॒तस्य॑ । त्वम् । ए॒क॒ऽवृ॒ष: । भ॒व॒ ॥८६.१॥

Mantra without Swara
वृषेन्द्रस्य वृषा दिवो वृषा पृथिव्या अयम्। वृषा विश्वस्य भूतस्य त्वमेकवृषो भव ॥

वृषा । इन्द्रस्य । वृषा । दिव: । वृषा । पृथिव्या: । अयम् । वृषा । विश्वस्य । भूतस्य । त्वम् । एकऽवृष: । भव ॥८६.१॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (अयम्) = यह प्रभु (इन्द्रस्य) = सूर्य का-सूर्य के अधिष्ठान धुलोक का (वृषा) = स्वामी है [वृषु ऐश्वर्य], (दिव:) = इस जगमगाते अन्तरिक्षलोक का (वृषा) = स्वामी है तथा (पृथ्व्यिा:) = पृथिवीलोक का स्वामी है। २. यह प्रभु (सर्वस्य भूतस्य वृषा) = सब प्राणियों का स्वामी है। हे उपासक | तू भी इस 'वृषा' प्रभु का उपासन करता हुआ (एकवृषः भव) = अद्वितीय शक्तिशाली बन । अपनी इन्द्रियों का स्वामी बनता हुआ 'एकवृष' बन।
Essence
प्रभु, 'धुलोक, अन्तरिक्षलोक व पृथ्विीलोक' के स्वामी हैं। वे सब भूतों के स्वामी हैं। इस वृषा का स्मरण करते हुए हम भी 'मस्तिष्क, हृदय व शरीर' के स्वामी बनते हुए एकवृष' बनें-अद्वितीय शक्तिशाली स्वामी बनें।
Subject
एकवृष