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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 6/85/3

142 Sukta
3 Mantra
6/85/3
Devata- वनस्पतिः Rishi- अथर्वा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- यक्ष्मानाशन सूक्त
Mantra with Swara
यथा॑ वृ॒त्र इ॒मा आप॑स्त॒स्तम्भ॑ वि॒श्वधा॑ य॒तीः।ए॒वा ते॑ अ॒ग्निना॒ यक्ष्मं॑ वैश्वान॒रेण॑ वारये ॥

यथा॑ । वृ॒त्र: । इ॒मा: । आप॑: । त॒स्तम्भ॑ । वि॒श्वधा॑ । य॒ती: । ए॒व । ते॒ । अ॒ग्निना॑ । यक्ष्म॑म् । वै॒श्वा॒न॒रेण॑ । वा॒र॒ये॒ ॥८५.३॥

Mantra without Swara
यथा वृत्र इमा आपस्तस्तम्भ विश्वधा यतीः।एवा ते अग्निना यक्ष्मं वैश्वानरेण वारये ॥

यथा । वृत्र: । इमा: । आप: । तस्तम्भ । विश्वधा । यती: । एव । ते । अग्निना । यक्ष्मम् । वैश्वानरेण । वारये ॥८५.३॥

Meaning
१. (यथा) = जैसे (वृत्रः) = मेघ विश्वधा (यती:) = सब ओर बहती हुई (इमा: आप:) = इन जलधाराओं को (तस्तम्भ) = रोके हुए हैं, (एव) = उसी प्रकार (ते यक्ष्मम्) = तेरे राजयोग को (वैश्वानरेण अग्रिना) = सब मनुष्यों का हित करनेवाले जाठराग्नि के द्वारा (वारये) = रोकता हूँ। २. जाठर अग्नि के ठीक होने पर शरीर में रोग नहीं आते। आये हुए रोग भी इस अग्नि के ठीक होने से दूर हो जाते हैं। वरणवृक्ष भी 'आग्नेय' है। इस अग्नि का प्रयोग भी रोग का निवारण करता ही है।
Essence
बादल पानी को रोक लेता है। वरणवृक्ष व वैश्वानर अग्नि [जाठराग्नि] रोग को रोकनेवाला हो। वरणवृक्ष का प्रयोग रोग को फैलने नहीं देता।


 
Subject
यक्ष्म-निवारण

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