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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 6/84/2

142 Sukta
4 Mantra
6/84/2
Devata- निर्ऋतिः Rishi- अङ्गिरा Chhanda- त्रिपदार्षी बृहती Suktam- निर्ऋतिमोचन सूक्त
Mantra with Swara
भूते॑ ह॒विष्म॑ती भवै॒ष ते॑ भा॒गो यो अ॒स्मासु॑। मु॒ञ्चेमान॒मूनेन॑सः॒ स्वाहा॑ ॥

भूते॑ । ह॒विष्म॑ती । भ॒व॒ । ए॒ष: । ते॒ । भा॒ग: । य: । अ॒स्मासु॑ । मु॒ञ्च । इ॒मान् । अ॒मून् । एन॑स: । स्वाहा॑ ॥८४.२॥

Mantra without Swara
भूते हविष्मती भवैष ते भागो यो अस्मासु। मुञ्चेमानमूनेनसः स्वाहा ॥

भूते । हविष्मती । भव । एष: । ते । भाग: । य: । अस्मासु । मुञ्च । इमान् । अमून् । एनस: । स्वाहा ॥८४.२॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. 'निर्ऋति' पाप-देवता है, तो 'भूति' ऐश्वर्य की देवता है। हे (भूते) = ऐश्वर्य की देवते! [विभूतिभूतिरैश्वर्यम्] तू (हविष्मती भव) = हविवाली हो। हम तुझे प्राप्त करके त्यागपूर्वक अदन [खाने]-वाले बनें। (एष:) = यह ही (ते भाग:) = तेरा सेवनीय व्यवहार है, (यः अस्मासु) = जो हममें हो, अर्थात् हम सदा तेरा त्यागपूर्वक ही अदन करनेवाले हैं। २. हे ऐश्वर्य! तू (इमान् अमून्) = इनको और उनको-श्रमिकों व पूंजीपतियों को (एनसः मुञ्च) = पाप से मुक्त कर। इनमें से कोई भी लोभ से तेरा ग्रहण करनेवाला न हो, सब त्यागपूर्वक ही तेरा अदन करें। इस पापवृत्ति से छुटने के लिए हम (स्वाहा) = आत्मसमर्पण करनेवाले व त्यागशील बनें।
Essence
हमारा ऐश्वर्य त्याग की वृत्ति से युक्त हो। सम्पत्ति का त्यागपूर्वक अदन ही सेवनीय व्यवहार है। त्यागवृत्ति होने पर यह ऐश्वर्य हमें पाप में नहीं फंसाता। त्याग की वृत्ति होने पर "श्रमिक और पूँजीपति' दोनों का ही व्यवहार ठीक बना रहता है।

 
Subject
हविष्मती 'भूमि'