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Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 6/83/4

142 Sukta
4 Mantra
6/83/4
Devata- सूर्यः, चन्द्रः Rishi- अङ्गिरा Chhanda- एकावसाना द्विपदा निचृदार्ची Suktam- भैषज्य सूक्त
Mantra with Swara
वी॒हि स्वामाहु॑तिं जुषा॒णो मन॑सा॒ स्वाहा॒ मन॑सा॒ यदि॒दं जु॒होमि॑ ॥

वी॒हि । स्वाम् । आऽहु॑तिम् । जु॒षा॒ण: । मन॑सा । स्वाहा॑ । मन॑सा । यत् । इ॒दम् । जु॒होमि॑ ॥८३.४॥

Mantra without Swara
वीहि स्वामाहुतिं जुषाणो मनसा स्वाहा मनसा यदिदं जुहोमि ॥

वीहि । स्वाम् । आऽहुतिम् । जुषाण: । मनसा । स्वाहा । मनसा । यत् । इदम् । जुहोमि ॥८३.४॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. हे रुग्णपुरुष! तू (स्वाम् आहुतिम्) = यज्ञशेष के रूप में ली गई अपनी इस भोज्य द्रव्य की आहुति को (मनसा जुषाण:) = मन से प्रीतिपूर्वक सेवन करता हुआ (वीहि) = खा। यजशेष का प्रीतिपूर्वक सेवन तुझे नीरोगता प्रदान करेगा। २. (यत् इदं जुहोमि) = यह जो मैं तुझे देता हूँ, उसे तू (मनसा) = मन के साथ-पूरे ध्यान के साथ (स्वाहा) = आहुत करनेवाला बन । तू यज्ञशेष ही खाना। यज्ञ करके बचे हुए को खाना ही अमृतभोजन है।

 
Essence
प्रीतिपूर्वक यज्ञशेष का सेवन करने से गण्डमाला आदि रोग उत्पन्न ही नहीं होते। उत्पन्न हुए-हुए भी नष्ट हो जाते हैं। एवं, औषध के साथ पथ्य-सेवन आवश्यक है।
Subject
प्रेमपूर्वक यज्ञशेष का सेवन