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Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 6/81/1

142 Sukta
3 Mantra
6/81/1
Devata- आदित्यः Rishi- अथर्वा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- गर्भाधान सूक्त
Mantra with Swara
य॒न्तासि॒ यच्छ॑से॒ हस्ता॒वप॒ रक्षां॑सि सेधसि। प्र॒जां धनं॑ च गृह्णा॒नः प॑रिह॒स्तो अ॑भूद॒यम् ॥

य॒न्ता । अ॒सि॒ । यच्छ॑से । हस्तौ॑ । अप॑ ।रक्षां॑सि । से॒ध॒सि॒ । प्र॒ऽजाम् । धन॑म् । च॒ । गृ॒ह्णा॒न: । प॒रि॒ऽह॒स्त: । अ॒भू॒त् । अ॒यम् ॥८१.१॥

Mantra without Swara
यन्तासि यच्छसे हस्तावप रक्षांसि सेधसि। प्रजां धनं च गृह्णानः परिहस्तो अभूदयम् ॥

यन्ता । असि । यच्छसे । हस्तौ । अप ।रक्षांसि । सेधसि । प्रऽजाम् । धनम् । च । गृह्णान: । परिऽहस्त: । अभूत् । अयम् ॥८१.१॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. गतसूक्त के अनुसार प्रभुपूजन की वृत्तिवाले हे पुरुष ! तू (यन्ता असि) = अपने जीवन को नियम में रखनेवाला है। पाणिग्रहण के समय तू (हस्तौ यच्छसे) = अपने हाथों को अपने जीवन साथी के लिए देता है, (रक्षांसि अप सेधिति) = विनाशक तत्त्वों को घर से दूर करता है-अपने मन में भी राक्षसीभावों का उदय नहीं होने देता। २. वस्तुत: (प्रजाम्) = सन्तान को (गलान:) = समीप भविष्य में प्राप्त करनेवाला (अयम्) = यह पुरुष (धनं च) = धन को भी [गृहानः] ग्रहण करने के स्वभाववाला-धनार्जन की योग्यतावाला परिहस्तः अभूत-हाथ का सहारा देनेवाला हुआ है। गृहस्थाश्रम में प्रवेश का मुख्योद्देश्य उत्तम सन्तान की प्राप्ति ही है और गृहस्थ को परिवार के पालन के लिए धन अवश्य कमाना है।
Essence
गृहस्थ में पति का जीवन बड़ा नियमित हो। उसका हृदय राक्षसीभावों से शून्य हो। प्रजा-प्राति की कामनावाला यह धर्नाजन की योग्यता से युक्त हो।
Subject
यन्ता परिहस्त: