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Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 6/78/1

142 Sukta
3 Mantra
6/78/1
Devata- चन्द्रमाः Rishi- अथर्वा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- धनप्राप्ति प्रार्थना सूक्त
Mantra with Swara
तेन॑ भू॒तेन॑ ह॒विषा॒यमा प्या॑यतां॒ पुनः॑। जा॒यां याम॑स्मा॒ आवा॑क्षु॒स्तां रसे॑ना॒भि व॑र्धताम् ॥

तेन॑ । भू॒तेन॑ । ह॒विषा॑ । अ॒यम् । आ । प्या॒य॒ता॒म् । पुन॑: । जा॒याम् । याम् । अ॒स्मै॒ । आ॒ऽअवा॑क्षु: । ताम् । रसे॑न । अ॒भि । व॒र्ध॒ता॒म् ॥७८.१॥

Mantra without Swara
तेन भूतेन हविषायमा प्यायतां पुनः। जायां यामस्मा आवाक्षुस्तां रसेनाभि वर्धताम् ॥

तेन । भूतेन । हविषा । अयम् । आ । प्यायताम् । पुन: । जायाम् । याम् । अस्मै । आऽअवाक्षु: । ताम् । रसेन । अभि । वर्धताम् ॥७८.१॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (तेन) = उस (भूतेन) = [भू प्रासी] भूति व समृद्धि की कारणभूत (हविषा) = हूयमान यजिय पदार्थों से (अयम्) = यह (पुन:) = फिर (आप्यायताम्) = वृद्धि को प्राप्त करे। गृहपति यज्ञशील हो, यज्ञशेष का ही सेवन करनेवाला हो। इस यज्ञशेष का सेवन अमृत का सेवन है। इससे उसका जीवन बड़ा नीरोग बना रहेगा। २. (याम्) = जिस (जायाम्) = पत्नी को (अस्मै) = इसके लिए (आवाक्षः) = कन्या के माता-पिता आदि प्राप्त कराते हैं, (ताम्) = उस पत्नी को (रसेन अभिवर्धताम्) = प्रेम के द्वारा यह बढ़ानेवाला हो। पत्नी को पति का उचित प्रेम प्रास होता है तो वह सब प्रकार से बढ़ती ही है।
Essence
एक उत्तम गृहपति यज्ञ के द्वारा यज्ञशेष का सेवन करता हुआ दृाङ्ग बने। पत्नी को यह उचित प्रेम प्राप्त कराता हुआ बढ़ानेवाला हो।
Subject
हविषा रसेन