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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 6/77/2

142 Sukta
3 Mantra
6/77/2
Devata- जातवेदा अग्निः Rishi- कबन्ध Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- प्रतिष्ठापन सूक्त
Mantra with Swara
य उ॒दान॑ट् प॒राय॑णं॒ य उ॒दान॒ण्न्याय॑नम्। आ॒वर्त॑नं नि॒वर्त॑नं॒ यो गो॒पा अपि॒ तं हु॑वे ॥

य: । उ॒त्ऽआन॑ट् । प॒रा॒ऽअय॑नम् । य: । उ॒त्ऽआन॑ट् । नि॒ऽअय॑नम् । आ॒ऽवर्त॑नम् । नि॒ऽवर्त॑नम् । य: । गो॒पा: । अपि॑ । तम् । हु॒वे॒ ॥७७.२॥

Mantra without Swara
य उदानट् परायणं य उदानण्न्यायनम्। आवर्तनं निवर्तनं यो गोपा अपि तं हुवे ॥

य: । उत्ऽआनट् । पराऽअयनम् । य: । उत्ऽआनट् । निऽअयनम् । आऽवर्तनम् । निऽवर्तनम् । य: । गोपा: । अपि । तम् । हुवे ॥७७.२॥

Meaning
१. (य:) = जो (गोपा:) =  हमारी इन्द्रियों का रक्षक प्रभु (परायणम्) = परम स्थान मोक्ष को-ऊँचे से-ऊँचे लोकों को भी व्याप्त कर रहा है और (यः) = जो (न्यायनम् उदानट्) = निचले लोकों को भी व्यास कर रहा है, वह प्रभु ही (आवर्तनम्) = विविध योनियों में हमारे आवर्तन को तथा निवर्तनम् योनियों से निवृत्त होकर मोक्ष-प्राप्ति को व्याप्त करता है, (अपितं हुवे) = क्या मैं उसे पुकारूँगा? क्या मेरे जीवन में वह शुभ दिन आएगा जबकि मैं उस प्रभु का स्मरण करनेवाला बनूंगा।
Essence
वह शुभ दिन होगा जब मैं इन्द्रियों को विषयों से हटाकर उस प्रभ का स्मरण करनेवाला बनूंगा। वे प्रभु दूर-से-दूर व समीप-से-समीप हैं। वे ही हमें विविध शरीरों में जन्म व मोक्ष प्राप्त कराते हैं।
Subject
आवर्तनं निवर्तनम्

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