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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 6/74/3

142 Sukta
3 Mantra
6/74/3
Devata- सामंनस्यम्, नाना देवताः, त्रिणामा Rishi- अथर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- सांमनस्य सूक्त
Mantra with Swara
यथा॑दि॒त्या वसु॑भिः सम्बभू॒वुर्म॒रुद्भि॑रु॒ग्रा अहृ॑णीयमानाः। ए॒वा त्रि॑णाम॒न्नहृ॑णीयमान इ॒माञ्जना॒न्त्संम॑नसस्कृधी॒ह ॥

यथा॑ । आ॒दि॒त्या: । वसु॑ऽभि: । स॒म्ऽब॒भू॒वु: । म॒रुत्ऽभि॑: । उ॒ग्रा: । अहृ॑णीयमाना: । ए॒व । त्रि॒ऽना॒म॒न् । अहृ॑णीयमान: । इ॒मान् । जना॑न् । सम्ऽम॑नस: । कृ॒धि॒ । इ॒ह ॥७४.३॥

Mantra without Swara
यथादित्या वसुभिः सम्बभूवुर्मरुद्भिरुग्रा अहृणीयमानाः। एवा त्रिणामन्नहृणीयमान इमाञ्जनान्त्संमनसस्कृधीह ॥

यथा । आदित्या: । वसुऽभि: । सम्ऽबभूवु: । मरुत्ऽभि: । उग्रा: । अहृणीयमाना: । एव । त्रिऽनामन् । अहृणीयमान: । इमान् । जनान् । सम्ऽमनस: । कृधि । इह ॥७४.३॥

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Meaning
१. (यथा) = जैसे (आदित्या:) = सूर्यसमान ज्ञान-दीत आचार्य (वसुभिः) = उत्तम निवासवाले आचार्य के समीप प्रेम से रहनेवाले विद्यार्थियों के साथ (संबभूवः) = मिलकर रहते हैं तथा (उग्रा:) तेजस्वी राजा-शासक लोग (मरुद्भिः) = सैनिकों के साथ (अहृणीयमाना:) = क्रोध न करते  हुए रहते हैं, (एव)-उसी प्रकार हे (त्रिणामन्) = [नामन्-form, mode, manner] कृषि, गोरक्ष व वाणिज्यरूप तीन प्रकारों से धनार्जन करनेवाले वैश्य ! तू (अहणीयमानः) = क्रोध न करता हुआ (इमान् जनान्) = इन कार्य करनेवाले श्रमिक जनों को (इह) = यहाँ, अपने व्यापार-कर्म में (संमनसः कृधि) = समान मनवाला कर, तेरे साथ प्रेम से मिलकर वे इन कार्यों में तेरे सहायक हों।
Essence
आचार्य विद्यार्थियों के साथ प्रेम से रहें। राजा लोग सैनिकों के साथ एक मनवाले हों। वैश्य शूद्रों के साथ प्रेम से वर्तते हुए धनार्जन करें।
Subject
चातुर्वर्ण्य का परस्पर मेल
Special
इसप्रकार प्रेम से बर्ताव होने पर मनुष्य 'कबन्ध' बनता है-अपने में सुखों को बाँधनेवाला। यही अगले सूक्त का ऋषि है।