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Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 6/74/1

142 Sukta
3 Mantra
6/74/1
Devata- सामंनस्यम्, नाना देवताः, त्रिणामा Rishi- अथर्वा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- सांमनस्य सूक्त
Mantra with Swara
सं वः॑ पृच्यन्तां त॒न्वः सं मनां॑सि॒ समु॑ व्र॒ता। सं वो॒ऽयं ब्रह्म॑ण॒स्पति॒र्भगः॒ सं वो॑ अजीगमत् ॥

सम् । व॒: । पृ॒च्य॒न्ता॒म् । त॒न्व᳡: । सम् । मनां॑सि । सम् । ऊं॒ इति॑ । व्र॒ता । सम् । व॒: । अ॒यम् । ब्रह्म॑ण: । पति॑: । भग॑: । सम् । व॒: । अ॒जी॒ग॒म॒त् ॥७४.१॥

Mantra without Swara
सं वः पृच्यन्तां तन्वः सं मनांसि समु व्रता। सं वोऽयं ब्रह्मणस्पतिर्भगः सं वो अजीगमत् ॥

सम् । व: । पृच्यन्ताम् । तन्व: । सम् । मनांसि । सम् । ऊं इति । व्रता । सम् । व: । अयम् । ब्रह्मण: । पति: । भग: । सम् । व: । अजीगमत् ॥७४.१॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. उत्तम शिक्षा को प्राप्त लोग राष्ट्र में प्रेम से रहें। प्रभु कहते हैं कि (वः तन्व:) = तुम्हारे शरीर (संपच्यन्ताम्) = एक-दूसरे से प्रेम से मिला करें-आप परस्पर प्रेम से आलिङ्गन किया करो-राष्ट्र में कन्धे-से-कन्धे मिलाकर चलो। (मनांसि सम्) = आप लोगों के मन भी मिले हुए हों-हृदयों में प्रेम हो नकि द्वेष। (उ) = और (व्रता सम्) = आप लोगों के कर्म भी मिलकर हों-एक दूसरे के लिए सहायक हों। २. (अयम्) = यह (ब्रह्मणस्पति:) = ज्ञान का स्वामी प्रभु (वः) = तुम्हें (सम् अजीगमत्) = सदा संगत रक्खे तथा (वः) = तुम्हें (भग:) = यह ऐश्वर्यवान् प्रभु (सम्) = मिलाये रक्खे। सब लोग ज्ञान-सम्पन्न बनें और उचित ऐश्वर्यों को प्राप्त करते हुए परस्पर प्रेम से मिलकर रहें।
Essence
राष्ट्र के उत्थान के लिए आवश्यक है कि लोग परस्पर प्रेम से मिलें, उनके मनों में द्वेष न हो। उनके कर्म अविरोधी हों। ज्ञान व ऐश्वर्य-सम्पन्न होते हुए सब मिलकर चलें। 
Subject
मेल [परस्पर प्रेम]