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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 6/7/3

142 Sukta
3 Mantra
6/7/3
Devata- विश्वे देवाः Rishi- अथर्वा Chhanda- गायत्री Suktam- असुरक्षयण सूक्त
Mantra with Swara
येन॑ देवा॒ असु॑राणा॒मोजां॒स्यवृ॑णीध्वम्। तेना॑ नः॒ शर्म॑ यच्छत ॥

येन॑ । दे॒वा॒: । असु॑राणाम् । ओजां॑सि । अवृ॑णीध्वम् । तेन॑ । न॒: । शर्म॑ । य॒च्छ॒त॒ ॥७.३॥

Mantra without Swara
येन देवा असुराणामोजांस्यवृणीध्वम्। तेना नः शर्म यच्छत ॥

येन । देवा: । असुराणाम् । ओजांसि । अवृणीध्वम् । तेन । न: । शर्म । यच्छत ॥७.३॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. हे (देवा:) = शत्रु-विजय की कामनावाले साधको। (येन) = जिस मार्ग से तुमने (असुराणा ओजांसि) = असुरों के बलों को-आसुरभावों की प्रचण्ड शक्ति को (अवृणीध्वम्) = रोका है निवारण किया है (तेन) = उसी मार्ग से (न:) = हमारे लिए (शर्म यच्छत) = कल्याण व सुख प्राप्त कराइए।
Essence
हम देवों के मार्ग पर चलते हुए आसुरभावों की शक्ति को रोकें और सुख प्राप्त करें।
Subject
असुर ओज-निवारण
Special
अगले दो सूक्तों का ऋषि जमदग्नि है। 'चक्षुर्वै जमदनिषिः , यदनेन जगत् पश्यत्यथो मनुते तस्माच्चक्षर्जमदग्रिक्रषिः [श०८.१.३.३] चक्षु ही जमदग्नि है। चक्षु से संसार को ठीक रूप में देखकर उसका मनन करता है। ऐसा ही व्यक्ति सद्गृहस्थ बनता है। वह पत्नी से कहता है -